जब युवा सड़क पर हो और सत्ता सफाई में: आखिर सुन कौन रहा है?

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लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक स्थिति जाननी हो तो उसके शेयर बाजार, ऊँची इमारतों या चुनावी भाषणों को मत देखिए। उसके युवाओं की आँखों में झाँकिए। यदि वहाँ उम्मीद दिखाई दे तो समझिए राष्ट्र सही दिशा में है, और यदि वहाँ गुस्सा, निराशा तथा अविश्वास दिखाई दे तो समझिए कहीं न कहीं व्यवस्था की बुनियाद में दरार पड़ चुकी है।

आज भारत एक ऐसे ही दौर से गुजर रहा है जहाँ विकास के दावे और युवाओं की बेचैनी समानांतर चल रहे हैं।

एक ओर देश विश्वगुरु बनने की बातें कर रहा है, दूसरी ओर प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और बेरोजगारी को लेकर युवाओं का असंतोष खुलकर सामने आ रहा है। हाल के वर्षों में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को लेकर उठे प्रश्नों ने शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत दाँव पर लगाकर परीक्षा देते हैं, लेकिन जब परीक्षा की निष्पक्षता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाए तो सबसे बड़ा नुकसान केवल अंकों का नहीं बल्कि विश्वास का होता है।

इसी पृष्ठभूमि में उभरा तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” आंदोलन केवल एक व्यंग्यात्मक अभियान नहीं रह गया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन ने यह संकेत दिया कि युवाओं का एक वर्ग स्वयं को व्यवस्था से उपेक्षित महसूस कर रहा है। आंदोलन का केंद्र शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दे रहे हैं तथा इसमें शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठी।

लोकतंत्र में विरोध कोई अपराध नहीं होता। बल्कि कई बार विरोध ही लोकतंत्र को जीवित रखता है। लेकिन जब विरोध की आवाज़ इतनी तीव्र हो जाए कि वह पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाए, तब सत्ता का पहला कर्तव्य उसे केवल विरोध मानकर खारिज करना नहीं, बल्कि उसके कारणों को समझना होता है।

इसी दौरान एक और बहस सामने आई। एक वरिष्ठ टीवी एंकर द्वारा यूट्यूब शिक्षकों को लेकर की गई टिप्पणी ने देशभर के ऑनलाइन शिक्षकों और छात्रों के बीच विवाद खड़ा कर दिया। मामला अब अदालत तक पहुँच चुका है।

यह विवाद केवल दो व्यक्तियों या दो मंचों का नहीं है। यह उस बदलते भारत की कहानी है जहाँ ज्ञान का स्रोत बदल रहा है। कभी केवल विद्यालय और विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र थे। आज लाखों विद्यार्थी डिजिटल मंचों से पढ़ रहे हैं। ऐसे में पारंपरिक मीडिया और नए डिजिटल मंचों के बीच टकराव स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सच है कि छात्र किसी पक्ष की लड़ाई नहीं लड़ रहे। वे केवल बेहतर शिक्षा और निष्पक्ष अवसर चाहते हैं।

दूसरी ओर, कोचिंग संस्थानों से जुड़े विवाद, प्रशासनिक कार्रवाई, सुरक्षा मानकों पर प्रश्न और कानूनी प्रक्रियाएँ भी चर्चा में हैं। यदि किसी संस्थान में सुरक्षा संबंधी कमियाँ हैं तो उनका सुधार होना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि कार्रवाई निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमों के अनुरूप हो। लोकतंत्र में कानून का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं बल्कि सुधार और न्याय होता है।

इन घटनाओं को केवल अलग-अलग समाचारों की तरह नहीं देखा जा सकता। इन्हें जोड़ने वाली एक साझा रेखा है-युवा असंतोष।

और यह असंतोष ऐसे समय में उभर रहा है जब विश्व स्वयं अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है। विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे युद्धों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डाला है। महँगाई, रोजगार और निवेश से जुड़ी चुनौतियाँ लगभग हर देश झेल रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।

ऐसे समय में सरकार की भूमिका केवल विकास के आँकड़े प्रस्तुत करना नहीं हो सकती। सरकार का दायित्व है कि वह युवाओं को भरोसा दे, शिक्षा संस्थानों की विश्वसनीयता मजबूत करे, भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध बनाए और परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाए।

साथ ही मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन जब समाज का एक वर्ग मीडिया को “गोदी मीडिया” कहने लगे और दूसरा वर्ग उसी मीडिया को राष्ट्रवादी कहकर बचाव करे, तब सबसे बड़ा नुकसान पत्रकारिता की विश्वसनीयता को होता है।

मीडिया का काम सत्ता का प्रवक्ता बनना नहीं है, और न ही स्थायी विरोधी बनना है। उसका दायित्व है प्रश्न पूछना। यदि प्रश्न केवल विपक्ष से पूछे जाएँ और सत्ता से नहीं, तो पत्रकारिता कमजोर होती है। और यदि प्रश्न केवल सत्ता से पूछे जाएँ और विपक्ष से नहीं, तब भी पत्रकारिता अधूरी रहती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि देश का विमर्श व्यक्तियों से हटकर संस्थाओं पर केंद्रित हो।

प्रश्न यह नहीं कि कौन सा नेता सही है और कौन गलत।

प्रश्न यह है कि क्या परीक्षा प्रणाली पर जनता भरोसा करती है?

क्या एक छात्र को विश्वास है कि उसकी मेहनत का परिणाम निष्पक्ष होगा?

क्या एक बेरोजगार युवक को लगता है कि अवसर योग्यता के आधार पर मिलेगा?

क्या मीडिया पर जनता का भरोसा पहले जैसा है?

और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न- क्या सत्ता जनता की बेचैनी को सुन रही है?

लोकतंत्र की शक्ति चुनावों से आती है, लेकिन उसकी स्थिरता विश्वास से आती है।

जिस दिन युवा अपने सपनों पर से विश्वास खो देता है, उस दिन किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा संकट शुरू हो जाता है।

इसलिए आज आवश्यकता केवल बहस की नहीं, सुधार की है। केवल बयान की नहीं, जवाबदेही की है। केवल विरोध की नहीं, समाधान की है।

क्योंकि राष्ट्र तब मजबूत नहीं बनता जब सत्ता आलोचना से बच जाए; राष्ट्र तब मजबूत बनता है जब सत्ता आलोचना को सुनकर स्वयं को बेहतर बनाए।


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