जब लालच रिश्तों से बड़ा हो जाता है

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लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना

किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी इमारतों, सड़कों या आर्थिक प्रगति से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी बेटियों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिस समाज में बेटियाँ सम्मान और सुरक्षा के साथ जीती हैं, वही समाज वास्तव में सभ्य कहलाने का अधिकार रखता है।

हाल के दिनों में चर्चित ट्विशा शर्मा प्रकरण ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस मामले में दहेज उत्पीड़न और संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु की जांच के दौरान सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी गिरीबाला सिंह की गिरफ्तारी ने अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मामला अभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष अदालत ही तय करेगी। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर समाज को आईना दिखा दिया है कि दहेज की मानसिकता कितनी गहरी और खतरनाक हो सकती है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि दहेज केवल आर्थिक अपराध नहीं है, यह मानवीय मूल्यों का पतन है। विवाह, जो दो परिवारों के मिलन का उत्सव होना चाहिए, वह कई बार लेन-देन और सौदेबाजी का मंच बन जाता है। लड़की को एक इंसान नहीं, बल्कि सुविधाओं और संपत्ति के स्रोत की तरह देखने की प्रवृत्ति आज भी समाज के अनेक हिस्सों में जीवित है।

हम इक्कीसवीं सदी में पहुँच चुके हैं। देश चंद्रमा तक पहुँच गया, डिजिटल अर्थव्यवस्था की बातें कर रहा है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर शोध कर रहा है। लेकिन दूसरी तरफ आज भी ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ किसी बेटी का मूल्य उसके संस्कार, शिक्षा और व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि उसके साथ आने वाले धन और उपहारों से आँका जाता है।

यह केवल कानून की विफलता नहीं है, यह समाज की सामूहिक विफलता है।

दहेज का लालच कभी अचानक पैदा नहीं होता। इसकी शुरुआत छोटी-छोटी अपेक्षाओं से होती है। पहले इसे “उपहार” कहा जाता है, फिर “सहयोग” कहा जाता है, फिर “प्रतिष्ठा” का प्रश्न बना दिया जाता है। धीरे-धीरे यही अपेक्षाएँ अधिकार का रूप ले लेती हैं। जब अपेक्षा पूरी नहीं होती तो ताने शुरू होते हैं, फिर मानसिक प्रताड़ना, फिर सामाजिक अपमान और कई बार हालात इतने भयावह हो जाते हैं कि किसी बेटी का जीवन ही समाप्त हो जाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि दहेज की मानसिकता केवल अशिक्षित या गरीब वर्ग तक सीमित नहीं है। कई बार उच्च शिक्षित, प्रभावशाली और प्रतिष्ठित परिवार भी इस मानसिकता से मुक्त नहीं होते। यही कारण है कि जब किसी चर्चित परिवार या प्रभावशाली व्यक्ति का नाम ऐसे मामलों में सामने आता है, तो समाज और अधिक स्तब्ध हो जाता है। क्योंकि तब यह भ्रम टूट जाता है कि शिक्षा और पद अपने आप चरित्र की गारंटी हैं।

आज आवश्यकता केवल दोषियों को दंड देने की नहीं है। आवश्यकता उस सोच को बदलने की है जो दहेज को सामाजिक प्रतिष्ठा मानती है।

हमें स्वयं से पूछना होगा

क्या विवाह एक रिश्ता है या आर्थिक अनुबंध?

क्या बेटी किसी परिवार में सदस्य बनकर जाती है या निवेश बनकर?

क्या किसी युवक की शिक्षा, नौकरी और सामाजिक स्थिति का मूल्य नकद, गाड़ी या संपत्ति से लगाया जाना चाहिए?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” है, तो फिर समाज में दहेज की प्रथा अभी तक क्यों जीवित है?

कटु सत्य यह है कि दहेज लेने वाला अकेला दोषी नहीं होता। कई बार समाज भी अप्रत्यक्ष रूप से उसका सहयोगी बन जाता है। लोग जानते हैं कि दहेज लिया गया है, लेकिन उसे “परंपरा” कहकर स्वीकार कर लेते हैं। लोग जानते हैं कि बेटी पर दबाव डाला जा रहा है, लेकिन उसे “समायोजन” का नाम दे देते हैं। लोग जानते हैं कि वह पीड़ित है, लेकिन उसे “घर बचाने” की सलाह देते रहते हैं।

यहीं से अपराध को शक्ति मिलती है।

किसी भी बेटी को यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि हर हाल में सहन करो। उसे यह सिखाया जाना चाहिए कि उसका सम्मान, उसका जीवन और उसकी गरिमा किसी भी रिश्ते से बड़ी है।

एक और प्रश्न जो समाज को परेशान करता है, वह यह है कि आखिर ऐसा क्यों है कि विवाह के कुछ महीनों या वर्षों के भीतर दहेज और उत्पीड़न की खबरें बार-बार सामने आती हैं? इसका उत्तर हमारे सामाजिक ढाँचे में छिपा है। हम विवाह की तैयारी में लाखों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन विवाह के बाद स्वस्थ रिश्ते कैसे बनाए जाएँ, इसका प्रशिक्षण किसी को नहीं देते। हम भव्य आयोजन करते हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाओं को विकसित करने पर उतना ध्यान नहीं देते।

ट्विशा शर्मा प्रकरण की जांच अभी जारी है और न्यायिक प्रक्रिया अपना काम करेगी। लेकिन इस घटना को केवल एक समाचार बनाकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि दहेज का लालच केवल एक व्यक्ति को नहीं मारता। यह परिवारों को तोड़ता है, माता-पिता के सपनों को तोड़ता है, समाज के विश्वास को तोड़ता है और अंततः मानवता को घायल करता है।

जिस दिन समाज यह तय कर लेगा कि दहेज लेने वाला सम्मान का नहीं, शर्म का पात्र होगा, उसी दिन वास्तविक परिवर्तन शुरू होगा।

क्योंकि किसी भी बेटी की कीमत सोने, गाड़ी, मकान या नकद से नहीं लगाई जा सकती।

और जिस समाज में बेटियों का मूल्य धन से तय होने लगे, वह समाज चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न दिखाई दे, भीतर से अभी भी अंधकार में ही खड़ा होता है।

दहेज कोई परंपरा नहीं है। दहेज सभ्यता के चेहरे पर लगा वह दाग है, जिसे मिटाना अब केवल कानून नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।


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3 thoughts on “जब लालच रिश्तों से बड़ा हो जाता है

  1. “जब लालच रिश्तों से बड़ा हो जाता है “ब्लॉग समसामयिक घटनाओं से प्रेरित है.यह सही है कि आज समाज में महिलाओं की स्थिति नगण्य सी होकर रह गई है जिसका मूल कारण जन-सामान्य की धनलोलुपता है.वर्तमान में कुछ परिवर्तन दिख रहा है जो नाकाफी है. ब्लॉग सार्थक एवं विषय वस्तु के साथ न्याय करता है.

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