“सफ़र के उस पार”

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लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना ©️

गर्मी अपने पूरे तेवर में थी। हवा भी जैसे तपकर चल रही थी। ऐसे मौसम में लोग जहाँ घरों में दुबकना पसंद करते हैं, वहीं अनन्या ने एक बार फिर सफ़र चुन लिया-गर्म प्रदेश से दूर, पहाड़ों की ठंडी वादियों की ओर।

अनन्या-नाम ही उसके स्वभाव का परिचय देता था, “जिसका कोई दूसरा नहीं।”
32 वर्ष की उम्र में भी वह अकेली थी, लेकिन उसके लिए यह अकेलापन किसी कमी का प्रतीक नहीं था, बल्कि उसकी अपनी चुनी हुई स्वतंत्रता थी। वह एक निजी कंपनी में कार्यरत थी-पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर, और अपने विचारों में पूरी तरह स्पष्ट।

वह अक्सर कहा करती थी-
“जीवन को आज में जीना चाहिए, कल के लिए खुद को बाँध लेना मुझे मंज़ूर नहीं।”

ऑफिस की भागदौड़ भरी जिंदगी से जैसे ही उसे कुछ दिन का अवकाश मिलता, वह किसी नए सफ़र पर निकल जाती। कभी समुद्र किनारे घंटों बैठी लहरों से बातें करती, तो कभी पहाड़ों में खोकर खुद को ढूंढती। उसे यह भ्रमण केवल घूमने के लिए नहीं, बल्कि खुद को समझने के लिए जरूरी लगता था।

उस दिन भी वह ट्रेन की खिड़की वाली सीट पर बैठी थी। बाहर तपती धरती धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी। हवा गर्म थी, लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी ठंडक थी-एक सुकून।

उसी बोगी में, ठीक सामने वाली सीट पर एक युवक बैठा था-आरव
उसका चेहरा शांत था, आँखों में एक ठहराव और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान। वह भी खिड़की से बाहर देख रहा था, जैसे किसी गहरी सोच में डूबा हो।

कुछ समय तक दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई।
फिर अचानक एक विक्रेता की आवाज़ आई-“ठंडा पानी… जूस…”

अनन्या ने एक ठंडे पानी की बोतल ली। जैसे ही उसने बोतल खोलने की कोशिश की, ढक्कन फिसल गया और पानी थोड़ा सा छलककर उसकी किताब पर गिर गया।

“एक मिनट…”
सामने बैठे आरव ने तुरंत अपना रुमाल आगे बढ़ाया।

“शुक्रिया,” अनन्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

“सफ़र में छोटी-छोटी असुविधाएँ ही यादगार बन जाती हैं,” आरव ने सहज स्वर में कहा।

“और शायद छोटी-छोटी मुलाकातें भी,” अनन्या ने जवाब दिया।

बस, यहीं से बातचीत की शुरुआत हो गई।

“आप घूमने जा रही हैं?”
आरव ने पूछा।

“हाँ… और शायद खुद से मिलने,” अनन्या ने मुस्कुराकर कहा।

आरव ने हल्के आश्चर्य से देखा-
“यह जवाब तो मेरा होना चाहिए था।”

दोनों हँस पड़े।

“आप?”
अनन्या ने पूछा।

“मैं भी… शायद भाग नहीं रहा, लेकिन कुछ ढूंढ जरूर रहा हूँ,” आरव ने कहा।

बातों का सिलसिला धीरे-धीरे गहराता गया।

“आप शादीशुदा हैं?”
अनन्या ने सीधे पूछा।

“नहीं,” आरव ने जवाब दिया, “और आप भी नहीं हैं, यह समझना मुश्किल नहीं था।”

“क्यों?”
“क्योंकि आपके चेहरे पर एक अलग तरह की आज़ादी है… और थोड़ा-सा अकेलापन भी।”

अनन्या कुछ पल के लिए चुप हो गई।
फिर बोली-
“मैंने शादी इसलिए नहीं की क्योंकि मुझे अपनी आज़ादी प्यारी है। मैं किसी के लिए खुद को बदलना नहीं चाहती।”

आरव ने शांत स्वर में कहा-
“और अगर कोई आपको बदलना ही न चाहे… बस आपके साथ चलना चाहे?”

यह सवाल अनन्या के भीतर कहीं गहराई तक उतर गया।

“आपका क्या मानना है?” उसने पूछा।

आरव ने खिड़की के बाहर बदलते दृश्य को देखते हुए कहा-
“मेरा मानना है कि जीवन अकेले भी जिया जा सकता है, लेकिन साथ में जिया जाए तो उसका अर्थ और गहरा हो जाता है।
अकेलापन हमें मजबूत बनाता है…
और साथ हमें पूरा करता है।”

अब ट्रेन गर्म मैदानों से निकलकर हरियाली की ओर बढ़ने लगी थी। हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी।

अनन्या ने धीरे से कहा-
“कभी-कभी अकेलापन बहुत भारी लगने लगता है… लेकिन फिर मैं खुद को समझा लेती हूँ कि यही मेरी पसंद है।”

आरव ने मुस्कुराकर कहा-
“और कभी ऐसा नहीं लगा कि कोई हो… जो उस अकेलेपन को बिना छीनें, बस बाँट ले?”

अनन्या के पास इस बार कोई जवाब नहीं था।
वह बस बाहर देखने लगी।

ट्रेन अब अपने अंतिम पड़ाव के करीब थी।

दोनों के बीच अब शब्द कम थे, लेकिन एक अनकहा जुड़ाव बन चुका था।

उतरने से पहले आरव ने कहा-
“शायद जीवन में ज़रूरी यह नहीं कि हम अकेले रहें या साथ में…
बल्कि यह है कि हम जो भी चुनें, उसमें सच्चे रहें।”

अनन्या ने मुस्कुराकर कहा-
“और यह भी कि हम अपनी सोच के दरवाज़े हमेशा खुले रखें।”

दोनों प्लेटफॉर्म पर उतर गए।
लोगों की भीड़ में वे धीरे-धीरे अलग दिशाओं में बढ़ने लगे।

कुछ कदम चलने के बाद अनन्या ने पीछे मुड़कर देखा-
आरव भी उसे ही देख रहा था।

दोनों ने हल्की-सी मुस्कान के साथ एक-दूसरे को अलविदा कहा-बिना शब्दों के।

अनन्या आगे बढ़ती रही, लेकिन उसके भीतर कुछ बदल चुका था।
पहाड़ों की ठंडी हवा अब उसके चेहरे को छू रही थी, लेकिन उसके मन में एक नया विचार जन्म ले चुका था

“शायद आज़ादी का मतलब अकेले रहना नहीं…
बल्कि सही इंसान के साथ रहते हुए भी खुद को बनाए रखना है।”

वह मुस्कुराई।
शायद यह सफ़र सिर्फ़ जगह बदलने का नहीं था, सोच बदलने का भी था।

उधर, आरव भी स्टेशन से बाहर निकल चुका था।

उसने एक पल के लिए रुककर आसमान की ओर देखा।
फिर धीरे-से खुद से कहा

“शायद मैं जिस जवाब को ढूंढने निकला था, उसका एक हिस्सा मुझे मिल गया है।”

उसने महसूस किया कि वह हमेशा से साथ चाहता था, लेकिन डरता था कि कहीं वह अपनी पहचान न खो दे।
आज उसे समझ आया

“सही साथ वो होता है, जहाँ आपको खुद को खोना नहीं पड़ता…
बल्कि आप और बेहतर हो जाते हैं।”

आरव के कदम अब पहले से हल्के थे।
वह भी उसी तरह मुस्कुरा रहा था जैसे कोई अधूरी कहानी अपने सही समय का इंतज़ार कर रही हो।

दोनों अपने-अपने रास्तों पर आगे बढ़ गए
शायद फिर कभी न मिलने के लिए,
या शायद किसी और सफ़र में फिर मिलने के लिए।

लेकिन उस दिन, उस सफ़र में
दो अजनबी सिर्फ़ मिले नहीं थे,
बल्कि एक-दूसरे की सोच में एक छोटा-सा बदलाव छोड़ गए थे।

और कभी-कभी,
जीवन को बदलने के लिए इतना ही काफ़ी होता है।


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