“टैक्स के बदले तसल्ली?-या अधिकारों का व्यवस्थित क्षरण”

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लेखक : एम बी बलवंत सिंह खन्ना

दुनिया एक अस्थिर दौर से गुजर रही है। कहीं युद्ध हैं, कहीं आर्थिक अनिश्चितता, कहीं संसाधनों पर संघर्ष। इन वैश्विक हलचलों का असर सीमाओं के भीतर भी महसूस किया जा रहा है-महँगाई बढ़ती है, आपूर्ति प्रभावित होती है, और आम आदमी की ज़िंदगी पर दबाव बढ़ता है।
लेकिन सवाल केवल युद्धों से पैदा हुई परिस्थितियों का नहीं है। असली सवाल यह है कि एक कल्याणकारी राज्य में नागरिकों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं की गुणवत्ता आखिर क्यों गिर रही है, जबकि वे इसके लिए नियमित रूप से टैक्स दे रहे हैं?

आज स्थिति यह है कि समस्याओं का समाधान नहीं, उनसे बचने के “निजी विकल्प” सुझाए जा रहे हैं।
गैस नहीं मिल रही? इंडक्शन खरीद लो।
पानी साफ नहीं है? वॉटर प्यूरीफायर लगा लो।
बिजली नहीं रहती? इनवर्टर ले लो।
सरकारी स्कूल ठीक नहीं? प्राइवेट स्कूल में दाखिला करा दो।
सरकारी अस्पताल भरोसेमंद नहीं? प्राइवेट स्पताल में इलाज करा लो।

और अब तो यह भी कहा जाने लगा है- हवा खराब है? एयर प्यूरीफायर खरीद लो।

तो फिर भइया सीधा सवाल उठता है-
आखिर हम टैक्स किस लिए दे रहे हैं?

क्या टैक्स केवल सरकार चलाने का माध्यम है, या फिर वह एक सामाजिक अनुबंध है-जहाँ नागरिक अपने हिस्से का योगदान देता है और बदले में उसे गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ मिलती हैं?

एक कल्याणकारी राज्य का मूल सिद्धांत यह है कि वह हर नागरिक को समान अवसर और न्यूनतम जीवन-स्तर की गारंटी दे। शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, स्वच्छ हवा- ये सुविधाएँ “सुविधा” नहीं, बल्कि अधिकार हैं।
लेकिन जब इन अधिकारों की गुणवत्ता गिरती है और समाधान के नाम पर बाज़ार की ओर धकेला जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नीतिगत विचलन है।

यह विचलन खतरनाक है, क्योंकि यह धीरे-धीरे समानता की नींव को कमजोर करता है।
जिसके पास पैसे हैं, वह बेहतर पानी, बेहतर शिक्षा, बेहतर इलाज खरीद लेगा।
जिसके पास नहीं हैं- वह उसी कमजोर व्यवस्था में फँसा रहेगा, जिसके सुधार की जिम्मेदारी राज्य की है।

क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ
अधिकार अमीरों के लिए “सेवाएँ” और गरीबों के लिए “समस्याएँ” बन जाएँ?

टैक्स केवल राजस्व नहीं होता, वह विश्वास होता है।
नागरिक यह विश्वास करता है कि उसका योगदान समाज के विकास, व्यवस्था की मजबूती और सभी के कल्याण में लगेगा।
लेकिन जब उसे हर बुनियादी जरूरत के लिए अलग से जेब ढीली करनी पड़े, तो यह विश्वास टूटता है।

और जब विश्वास टूटता है, तो केवल असंतोष नहीं जन्म लेता-
लोकतंत्र की जड़ें भी कमजोर होने लगती हैं।

यह तर्क दिया जा सकता है कि संसाधन सीमित हैं, जनसंख्या अधिक है, चुनौतियाँ जटिल हैं।
यह सब सही है।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि प्राथमिकताएँ स्पष्ट हों तो बदलाव संभव है।

प्रश्न यह नहीं कि समस्याएँ क्यों हैं-
प्रश्न यह है कि समाधान की दिशा क्या है?

क्या हम सार्वजनिक व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं,
या धीरे-धीरे उसे निजी विकल्पों के हवाले कर रहे हैं?

क्या सरकारी स्कूलों को इतना सक्षम बनाया जा रहा है कि वे किसी भी प्राइवेट स्कूल से प्रतिस्पर्धा कर सकें?
क्या सरकारी अस्पतालों में वह भरोसा पैदा किया जा रहा है कि आम नागरिक बिना डर के वहाँ जाए?
क्या पानी और हवा जैसी मूलभूत चीज़ों को शुद्ध रखने के लिए ठोस और दीर्घकालिक नीतियाँ बन रही हैं?

यदि इन सवालों के जवाब “नहीं” में हैं, तो समस्या केवल संसाधनों की नहीं, इरादों और जवाबदेही की भी है।

सबसे गंभीर बात यह है कि हमने इस स्थिति को सामान्य मानना शुरू कर दिया है।
बिजली नहीं आती-“चलता है।”
पानी गंदा है-“फिल्टर लगा लो।”
सरकारी अस्पताल में भीड़ है-“प्राइवेट चले जाओ।”

यह “चलता है” की मानसिकता ही व्यवस्था को जवाबदेही से मुक्त कर देती है।

एक नागरिक के रूप में हमें यह समझना होगा कि
सुविधाओं का निजीकरण समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उसकी स्वीकृति है।

यदि हर समस्या का हल “खुद खरीद लो” है,
तो फिर राज्य की भूमिका क्या रह जाती है?

यह संपादकीय केवल आलोचना के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए है।
सरकार के लिए भी, और समाज के लिए भी।

सरकार के लिए इसलिए कि वह अपने मूल दायित्वों को पहचाने और उन्हें प्राथमिकता दे।
और समाज के लिए इसलिए कि वह अपने अधिकारों को समझे और उनके लिए सवाल पूछे।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे ताकतवर हथियार केवल वोट नहीं होता-
सही समय पर पूछा गया सही सवाल भी होता है।

और आज का सबसे बड़ा सवाल यही है-

“जब हमें हर मूलभूत सुविधा खुद खरीदनी है,
तो हम टैक्स आखिर किस लिए दे रहे हैं?”


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3 thoughts on ““टैक्स के बदले तसल्ली?-या अधिकारों का व्यवस्थित क्षरण”

  1. श्री बलवंत जी,नमस्कार!आपका ब्लॉग समसामयिक विषय पर आधारित है…किन्तु आज की सरकारें,जन साधारण से वसूली टैक्स की रकम चुनाव जीतने के लिए लोक-लुभावने वादों को पूरा करने में खर्च कर देती हैं…जो उनकी मजबूरी भी है. जब तक ऐसा रहेगा तब-तक नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की बात करना बेमानी है …इसमें सुधार आने वाले वर्षों में तभी सम्भव है…जब मतदाताओं में जागरूकता आएगी.विषय वस्तु प्रभावी है.

    1. नमस्कार सर आपका विचार बिल्कुल सही उम्मीद है आने वाले दिनों में ऐसा संभव हो सके

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