लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना ©️
हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ आदमी की पहचान उसके नाम से कम और उसके रेफरेंस से ज़्यादा पूछी जाती है।
आज सबसे पहले सवाल यह नहीं होता कि आप क्या जानते हैं, क्या कर सकते हैं, कितने योग्य हैं
बल्कि यह होता है कि
“आप किसकी सिफ़ारिश से आए हैं?”
यह प्रश्न अब केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहा।
यह जीवन के हर मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है
इलाज में, शिक्षा में, व्यापार में, न्याय में, और यहाँ तक कि रिश्तों में भी।
आज का समाज धीरे-धीरे एक ऐसे ढाँचे में बदल गया है जहाँ
योग्यता पीछे खड़ी है
और पहचान आगे चल रही है।
रेफरेंस: एक शब्द नहीं, एक व्यवस्था
रेफरेंस यानी सिफ़ारिश, पहचान, जान-पहचान, पहुँच।
यह शब्द अब सुविधा का नहीं, आवश्यकता का प्रतीक बन गया है।
अगर आप कोई काम माँगने जाते हैं – रेफरेंस चाहिए।
अगर आप कुछ बेचना या खरीदना चाहते हैं -रेफरेंस चाहिए।
अगर आप नया काम शुरू करना चाहते हैं -रेफरेंस चाहिए।
अगर आप अच्छे अस्पताल में इलाज कराना चाहते हैं – रेफरेंस चाहिए।
अगर आप अच्छे स्कूल या कॉलेज में दाख़िला चाहते हैं – रेफरेंस चाहिए।
यहाँ तक कि कई बार थाने में शिकायत लिखवाने के लिए भी
रेफरेंस चाहिए।
जिसके पास रेफरेंस है, उसके लिए दरवाज़े अपने आप खुल जाते हैं।
जिसके पास रेफरेंस नहीं है, उसके लिए वही दरवाज़े दीवार बन जाते हैं।
संघर्ष बनाम सिफ़ारिश
एक तरफ़ वह युवा है जो वर्षों पढ़ाई करता है,
डिग्रियाँ लेता है,
मेहनत करता है,
और फिर लाइन में खड़ा होता है।

दूसरी तरफ़ वह व्यक्ति है
जिसके पास एक फोन कॉल है
और वही फोन कॉल
उसकी योग्यता बन जाती है।
यहाँ संघर्ष का अर्थ बदल गया है।
संघर्ष अब मेहनत से नहीं,
पहुँच से तय होता है।
आज कई लोग इसलिए नहीं हारते कि वे कमजोर हैं,
बल्कि इसलिए हारते हैं कि
उनके पास कोई “पहचान” नहीं होती।
इलाज भी पहचान माँगता है
बीमार आदमी जब अस्पताल जाता है
तो सबसे पहले डॉक्टर नहीं ढूँढता,
वह किसी जान-पहचान वाले को ढूँढता है।
क्योंकि उसे पता है
अगर रेफरेंस होगा
तो इलाज जल्दी होगा,
ध्यान ज़्यादा मिलेगा,
और फाइल तेज़ चलेगी।
और जिसके पास कोई नहीं,
वह घंटों लाइन में बैठा रहता है,
फॉर्म भरता है,
और इंतज़ार करता है
कि शायद उसकी बारी आ जाए।
क्या बीमारी यह पूछती है कि
तुम्हारे पास रेफरेंस है या नहीं?
नहीं।
लेकिन व्यवस्था पूछती है।
शिक्षा और सिफ़ारिश का गठजोड़
स्कूल और कॉलेज,
जो कभी समान अवसर के मंदिर माने जाते थे,
आज वहाँ भी पहचान की कतार लगी है।
मेधावी छात्र पीछे खड़ा है,
और साधारण छात्र आगे
क्योंकि उसके पीछे कोई नाम खड़ा है।
शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना था,
लेकिन अब वह संपर्क देने का केंद्र बनती जा रही है।
यह प्रश्न उठता है
क्या हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं
या उन्हें नेटवर्किंग सिखा रहे हैं?
रोज़गार का कड़वा सच
हर मंच पर युवा चिल्लाता है
“हमें रोज़गार चाहिए।”
लेकिन जब वह रोज़गार माँगने जाता है
तो उससे पूछा जाता है
“आप किसके रेफरेंस से आए हैं?”
यह वही युवा है
जिसे सिखाया गया था कि
मेहनत करो,
ईमानदार बनो,
योग्य बनो।
लेकिन अब उसे समझ आता है कि
योग्यता से ज़्यादा ज़रूरी है
पहचान बनाना।
यहीं से हताशा जन्म लेती है।
यहीं से गुस्सा पैदा होता है।
और यहीं से अविश्वास फैलता है।
रेफरेंस का दूसरा पक्ष
यह भी सच है कि रेफरेंस हमेशा गलत नहीं होता।
कभी-कभी वह भरोसे का माध्यम होता है।
कभी वह जिम्मेदारी का संकेत होता है।
कभी वह अनुभव का प्रमाण होता है।
लेकिन जब रेफरेंस
योग्यता का स्थान ले ले
तो वह व्यवस्था नहीं,
अन्याय बन जाता है।
जब पहचान के बिना
इंसान को इंसान न समझा जाए
तो समाज बीमार होने लगता है।
एक अदृश्य वर्ग विभाजन
आज समाज दो हिस्सों में बँटता जा रहा है:
एक वर्ग
जिनके पास पहुँच है,
सिफ़ारिश है,
नेटवर्क है।
दूसरा वर्ग
जिनके पास केवल मेहनत है।
पहले वर्ग को अवसर मिलते हैं।
दूसरे वर्ग को प्रतीक्षा।
पहले वर्ग को रास्ते मिलते हैं।
दूसरे वर्ग को कतारें।
यह अंतर धीरे-धीरे
आत्मसम्मान को तोड़ देता है।
हम क्या बनते जा रहे हैं?
हम एक ऐसा समाज बना रहे हैं
जहाँ बच्चों को यह सिखाया जा रहा है कि
“पढ़ाई ज़रूरी है,
लेकिन पहचान ज़्यादा ज़रूरी है।”
यह खतरनाक है।
क्योंकि जब इंसान को यह विश्वास हो जाए कि
मेहनत से कुछ नहीं होगा
और सब कुछ सिफ़ारिश से होगा
तो नैतिकता टूटने लगती है।
तब ईमानदारी बोझ बन जाती है।
और चालाकी गुण बन जाती है।
समाधान कहाँ है?
समाधान किसी एक नीति में नहीं,
हमारी सोच में है।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि
रेफरेंस सुविधा हो सकता है,
लेकिन नियम नहीं बनना चाहिए।
व्यवस्था ऐसी हो
जहाँ पहचान मदद करे
पर निर्णय योग्यता से हो।
जहाँ दरवाज़ा सबके लिए खुले
और भीतर वही जाए
जो योग्य हो।
अंतिम विचार
रेफरेंस आज हमारे जीवन का यथार्थ है।
इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन अगर यही हमारी एकमात्र पहचान बन गया
तो समाज भीतर से खोखला हो जाएगा।
क्योंकि एक दिन ऐसा आएगा
जब हर किसी के पास रेफरेंस होगा
लेकिन भरोसा किसी पर नहीं होगा।
हमें तय करना होगा कि
हम पहचान का समाज बनना चाहते हैं
या न्याय का समाज।
क्योंकि
जिस समाज में बिना सिफ़ारिश
इंसान की सुनवाई न हो
वहाँ सबसे पहले
मानवता हारती है।
और जब मानवता हारती है,
तो कोई व्यवस्था जीत नहीं सकती।


Nice