(विद्या निकेतन मॉडल कॉन्वेंट स्कूल, पामगढ़ – रजत जयंती समारोह 2026 के स्मरण में)
लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना ©️
रजत जयंती…
पच्चीस वर्षों की साधना, संघर्ष और संस्कार का उत्सव।
जब मुझे यह समाचार मिला कि विद्या निकेतन मॉडल कॉन्वेंट स्कूल, पामगढ़ अपना रजत जयंती समारोह मना रहा है, तो मन के भीतर कोई घंटी नहीं, बल्कि स्मृतियों की पूरी घंटाघर गूँज उठी।
एक कस्बाई क्षेत्र में किसी निजी विद्यालय का पच्चीस वर्षों तक निरंतर चलना, फलना-फूलना और पीढ़ियों को गढ़ना अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि है।
यह केवल स्कूल की नहीं, बल्कि उन सभी विद्यार्थियों की भी उपलब्धि है, जिन्होंने वहाँ से शिक्षा पाई और आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं।
इस समारोह की सबसे सुंदर बात यह थी कि इसमें राजनीति का शोर नहीं था, बल्कि शिक्षा की शांति थी।
यह भूत, वर्तमान और भविष्य का संगम था।
2000 से 2010 तक के विद्यार्थियों को मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाया गया और शेष सभी विद्यार्थियों को “स्कूल के सितारे” कहकर सम्मानित किया गया।
यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि स्मृतियों का महोत्सव था।
जब हम फिर से बच्चे बन गए
हमारा बैच 2007 का था।
तब स्कूल में लगभग 120 विद्यार्थी हुआ करते थे।
आज लगभग 50 साथी व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़े हैं और उनमें से करीब 26 लोग इस रजत जयंती समारोह में उपस्थित हो सके।

वे कुछ घंटे…
वास्तव में समय से परे थे।
हम उम्र भूल गए।
हम जिम्मेदारियाँ भूल गए।
हम वर्तमान और भविष्य छोड़कर सीधे अपने भूतकाल में चले गए।
हम अपने पुराने क्लासरूम में गए।
वही बेंच, वही ब्लैकबोर्ड, वही खिड़कियाँ…
बस फर्क इतना था कि अब दीवारें छोटी लगने लगी थीं और हम बड़े हो गए थे।
किसी ने कहा –
“यहीं बैठकर सर ने डाँटा था।”
किसी ने कहा –
“यहीं से पहली बार मंच पर बोलने गया था।”
किसी की आँखें नम थीं, किसी की हँसी छलक रही थी।
वह क्षण भावुक भी था और अमूल्य भी।
एक परिवार की तरह स्कूल
इस समारोह से लौटते समय मन में एक विचार बार-बार उठ रहा था –
स्कूल केवल पढ़ने की जगह नहीं होता,
वह जीवन की पहली प्रयोगशाला होता है।
यहाँ हमें केवल गणित या विज्ञान नहीं सिखाया जाता,
यहाँ हमें मनुष्य बनना सिखाया जाता है।
और इस प्रयोगशाला के प्रधान वैज्ञानिक थे –
आदरणीय श्री नरेंद्र पांडेय सर।

उन्होंने विद्यालय को केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक परिवार की तरह चलाया।
जहाँ हर बच्चा केवल रोल नंबर नहीं, बल्कि एक नाम था, एक कहानी था।
दो बच्चों की कहानी
इस पूरे अनुभव को मैं एक छोटी सी कहानी के माध्यम से कहना चाहता हूँ।
मान लीजिए, किसी परिवार में दो बेटे हैं।
पहला बेटा पढ़ाई में बहुत तेज।
अच्छे कॉलेज में गया।
फिर अच्छे शहर में नौकरी।
शुरुआत में त्योहारों पर गाँव आता है।
धीरे-धीरे आना कम होता है।
फिर वर्षों बीत जाते हैं।
उसके बच्चे गाँव को नहीं जानते,
और एक पीढ़ी अपनी जड़ों से कट जाती है।
दूसरा बेटा पढ़ाई में एवरेज।
लेकिन व्यवहार में तेज।
समाज में सक्रिय।
घर-गाँव से जुड़ा हुआ।
लोग उसे अक्सर कहते हैं –
“कुछ खास नहीं कर पाया।”
लेकिन वही बेटा
माता-पिता के पास रहता है,
त्योहारों में शामिल होता है,
और अपने स्कूल व गाँव से रिश्ता कभी नहीं तोड़ता।
समाज पहले को “लायक” कहता है
और दूसरे को “नालायक”।
मैं नालायक हूँ… और मुझे इस पर गर्व है

मैं स्वयं को उसी दूसरे बच्चे की तरह मानता हूँ।
स्कूल के दिनों में मैं भी एवरेज छात्र था।
न टॉपर, न मेडलिस्ट।
लेकिन एक बात मैंने कभी नहीं छोड़ी –
अपनी जड़ों से रिश्ता।
इन अठारह-उन्नीस वर्षों में
न गाँव छोड़ पाया,
न स्कूल।
मुझे कितना सम्मान मिला या नहीं मिला,
यह मैंने कभी नहीं गिना।
जब बुलावा आया,
मैं बिना किसी अहंकार,
बिना किसी दिखावे,
रजत जयंती समारोह में पहुँचा।
कुछ साथी ऐसे भी थे जो उपलब्ध होने के बावजूद नहीं आ पाए।
किसी के कारण वास्तविक थे,
लेकिन कुछ ने जानबूझकर दूरी बना ली।
विडंबना यह है कि वे वही थे
जो पढ़ाई में सबसे आगे थे,
जिन्हें हम “लायक” कहते थे।
और मैं…
एक नालायक,
जो आज भी अपने स्कूल की दहलीज पर सिर झुकाकर खड़ा है।
सम्मान पद से नहीं, संबंध से मिलता है
इस समारोह ने मुझे एक बड़ा पाठ पढ़ाया –
सम्मान पद से नहीं,
संबंध से मिलता है।
जो स्कूल को भूल गया,
वह चाहे कितना भी बड़ा अधिकारी बन जाए,
वह भीतर से गरीब हो जाता है।
और जो स्कूल को याद रखता है,
वह चाहे साधारण जीवन जिए,
वह भीतर से अमीर होता है।
रजत से स्वर्ण की ओर
मेरी यही कामना है कि
विद्या निकेतन मॉडल कॉन्वेंट स्कूल
अपने स्वर्ण जयंती (50 वर्ष) तक पहुँचे।
हम सब फिर मिलें।
फिर वही क्लासरूम।
फिर वही हँसी।
फिर वही नम आँखें।
और हमारे आदरणीय पांडेय सर
माँ सरस्वती की कृपा से
विद्या और स्वास्थ्य – दोनों में समृद्ध रहें।
अंतिम स्वीकारोक्ति
आज मैं गर्व से कहता हूँ –
हाँ,
मैं नालायक विद्यार्थी हूँ।
लेकिन ऐसा नालायक,
जो अपने स्कूल को नहीं भूलता,
जो अपने गाँव को नहीं छोड़ता,
जो अपने गुरु को प्रणाम करना जानता है।
अगर लायक होने की शर्त
जड़ों से कट जाना है,
तो मैं नालायक ही रहना पसंद करूँगा।
क्योंकि
स्कूल से जुड़ा रहना
सबसे बड़ी डिग्री है,
और
गुरुओं का आशीर्वाद
सबसे बड़ा पद।
नालायक होने पर मुझे गर्व है।

बहुत सुन्दर लेखनी
आँखे नम कर दिया तुमने बलवंत
प्रणाम सर
Wonderful writing 💯🤩😍😍