लेखक : एम बी बलवंत सिंह खन्ना ©️
प्रेम नाम जैसा ही था-मुलायम, आकर्षक और चंचल। निजी क्षेत्र की भागती-दौड़ती दुनिया में वह अपनी जगह बना चुका था। चालीस की उम्र ने उसके चेहरे पर अनुभव की रेखाएँ खींच दी थीं, पर आँखों की चमक अब भी वैसी ही थी, जैसी युवावस्था में होती है। शायद इसी चमक को लोग शुक्र ग्रह की मजबूती कह देते हैं-जहाँ प्रेम होता है, वहाँ आकर्षण भी स्वतः चला आता है।
उसकी पत्नी स्मृति-छत्तीस वर्ष की-नाम की तरह ही स्मृतियों की जैसी गहरी, स्थिर और समझदार। दो बच्चे-एक 10 साल का, दूसरा 7 साल का-उनकी दुनिया के केंद्र थे। घर, रिश्ते, बच्चों की हँसी, और पति की चुप्पियाँ-सब कुछ स्मृति बड़े सलीके से सँभालती थी।
प्रेम का मोबाइल हमेशा लॉक रहता।
चार्जिंग पर भी-लॉक।
टेबल पर पड़ा हो-लॉक।
प्रेम को लगता था, यह उसका निजी संसार है, जहाँ तक स्मृति की पहुँच नहीं।
पर वह नहीं जानता था कि स्मृति सिर्फ पत्नी नहीं थी-वह रिश्तों की पाठशाला में दीक्षित एक परिपक्व स्त्री थी। उसे पासवर्ड मालूम था। बहुत पहले से ही, पर उसने कभी इस ज्ञान को अधिकार की तरह इस्तेमाल नहीं किया।
कभी-कभी-जब प्रेम बाथरूम में होता, या बच्चों के साथ खेलते हुए मोबाइल कहीं छोड़ देता-स्मृति चुपचाप स्क्रीन देख लेती।
और कई बार…
कुछ शब्द दिख जाते।
कुछ नाम।
कुछ ऐसे संदेश, जिनमें दोस्ती की सीमा से आगे झाँकती आत्मीयता होती।
दिल चुपचाप कस जाता।
पर स्मृति ने कभी सवाल नहीं किया।
उसने कभी फोन पटककर नहीं कहा
“ये क्या है?”
“कौन है ये?”
क्योंकि स्मृति जानती थी-कुछ दरवाज़े ज़ोर से खोलने पर नहीं, समय से अपने आप खुलते हैं।
और कुछ सच ऐसे होते हैं, जिन्हें सामने लाने से सच हल्का नहीं होता-रिश्ता भारी हो जाता है।
वह अनजान बनी रही।
जानबूझकर।
उसे समझ थी कि यह भटकाव स्थायी नहीं होता।
उम्र के कुछ पड़ाव ऐसे होते हैं, जहाँ आदमी अपनी ही छाया से प्रभावित हो जाता है।
उसे यह भी पता था कि प्रेम के जीवन में जो भी आएँगे-वे क्षण होंगे,
लेकिन जो अंत तक साथ देगा-वह पत्नी होगी।
स्मृति ने प्रेम को बाँधकर नहीं रखा।
उसने प्रेम को समझकर थामा।
वह जानती थी
अगर आज वह सवाल करेगी, तो उत्तर रिश्ते को घायल कर देगा।
अगर आज वह रोएगी, तो बच्चे डरेंगे।
अगर आज वह टूटेगी, तो घर ढह जाएगा।
इसलिए उसने खुद को मजबूत रखा।
वह प्रेम के लिए वही बनी रही
सुबह की चाय,
बच्चों की फीस,
माँ की दवा,
और रात में थकी हुई चुप्पी में भी साथ बैठी एक भरोसेमंद उपस्थिति।
समय बीतता गया।
भटकाव धीरे-धीरे ऊब में बदला,
और ऊब एक खालीपन में।
तब प्रेम ने देखा
जो हर हाल में उसके साथ खड़ी रही,
जो बिना सवाल किए उसकी थकान समझती रही,
जो बिना शिकायत उसके बच्चों को सींचती रही
वह और कोई नहीं, स्मृति थी।
उस दिन प्रेम ने खुद से पहली बार सवाल किया
“मैं क्या खोज रहा था, जो मेरे पास पहले से था?”
स्मृति ने कभी यह नहीं कहा
“मैं जानती थी।”
उसने बस मुस्कुरा दिया।

क्योंकि वह जानती थी
पति अगर भटके, तो पत्नी का प्रेम रास्ता बन जाता है।
और रिश्ते अगर मजबूत हों, तो एक का डगमगाना दूसरे की स्थिरता से सँभल जाता है।
ओ री पत्नी,
तू सिर्फ़ साथ नहीं-
तू सम्बल है।
तू सवाल नहीं,
तू समाधान है।
तू अधिकार नहीं,
तू विश्वास है।
और सच यही है-
एक मजबूत पत्नी,
भटके हुए पति को
बिना तोड़े,
बिना शर्मिंदा किए,
चुपचाप
घर वापस ले आती है।

बहुत सुंदर लिखा है…