मिट्टी बुला रही थी…

Share

लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना

सुबह का सूरज अभी ठीक से निकला भी नहीं था।
हल्की सुनहरी रोशनी गाँव के पुराने पीपल के नीचे फैल रही थी। वहीं खड़ा था बिरजू-एक साधारण किसान, जिसकी हथेलियाँ सूखी थीं, पर उनमें अब भी मिट्टी की गर्माहट बाकी थी। वह अपने खेतों को देख रहा था। वही ज़मीन, वही सोंधी खुशबू… लेकिन मन आज भारी था।

रास्ते से गुजरते गाँव वाले बोलते जा रहे थे

“अरे बिरजू काका, अब बैल कहाँ मिलते हैं? सबने बेच डाले।”
“मशीनों का ज़माना है काका, अकेले कब तक खटोगे?”
“मजदूरी के दाम देखे हैं? छोटे किसान की तो कमर ही टूट जाए।”

बिरजू हल्की-सी मुस्कान दे देता, लेकिन दिल के भीतर कुछ टूटता चला जाता।
उसे याद आता—कभी यही हाथ सूरज ढलने तक हल चलाया करते थे। आज हाथ हैं, पर उनमें पहले-सी ताकत नहीं… और हालात भी साथ नहीं देते।

घर पहुँचा तो कमला दरवाज़े पर ही मिल गई। चेहरे पर चिंता साफ थी।
बोली,
“धान तो किसी तरह कट गया, पर रबी की बुवाई कैसे होगी? मजदूर नहीं मिलते, बैल किसी के पास बचे नहीं। लगता है अब खेती भगवान भरोसे है।”

बिरजू ने थकी हुई आवाज़ में कहा,
“कोशिश तो पूरी करूँगा कमला… पर अकेला आदमी कितना संभाले?”

उस दिन वह देर तक खेत में खड़ा रहा।
मिट्टी को देखता रहा-जैसे उसमें अपने पुरखों के पसीने की गंध खोज रहा हो।
मन ही मन बुदबुदाया,
“अगर इस बार बुवाई नहीं हुई… तो इस ज़मीन को क्या मुँह दिखाऊँगा?”

शाम ढलने लगी थी।
नीली-सी रोशनी चारों तरफ फैल रही थी, तभी जेब में रखा मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर नाम चमका-अमित।

बिरजू ने आवाज़ संभालते हुए फोन उठाया,
“हाँ बेटा… शहर में सब ठीक है?”

उधर से आदर भरी आवाज़ आई,
“बाबूजी प्रणाम। सब ठीक है। पढ़ाई पूरी हो गई है… और नौकरी का ऑफर भी मिला है।”

बिरजू के चेहरे पर हल्की चमक आ गई।
“अरे वाह! अब तो हमारी चिंता खत्म… नौकरी हो तो ज़िंदगी सँभल जाती है।”

फोन पर कुछ पल चुप्पी छा गई।
फिर अमित की आवाज़ आई-धीमी, लेकिन मजबूत।

“बाबूजी… मैंने नौकरी जॉइन नहीं की।”

बिरजू सन्न रह गया।
“क्या? पगला गया है क्या? इतनी मेहनत से पढ़ाया… अब सब छोड़ देगा?”

अमित की आवाज़ में भाव था-
“बाबूजी, शहर में पैसा है, पर मन नहीं लगता।
आप और माँ बूढ़े हो रहे हो, खेत अकेले पड़े हैं।
खेती छोड़ने की नहीं, बदलने की ज़रूरत है।
जो पढ़ा हूँ, जो सीखा है-वो यहीं काम आएगा।
मैं लौट रहा हूँ बाबूजी… आपके साथ खेती करने।”

बिरजू की आँखें भर आईं।
बस इतना कह पाया,
“आ जा बेटा… जल्दी आ जा।”

अगली सुबह गाँव की सड़क पर धूल उड़ती दिखी।
लोग घरों से बाहर निकल आए।
धूल के बीच से एक लाल ट्रैक्टर उभरा- पीछे ट्रॉली पर रोटावेटर, सीड-ड्रिल, कल्टीवेटर जैसे चमकते उपकरण।

गाँव में फुसफुसाहट फैल गई-
“बिरजू का बेटा लौट आया!”
“ट्रैक्टर लेकर आया है!”
“अब तो खेती में फिर जान आएगी!”

बिरजू और कमला दरवाज़े पर खड़े थे।
अमित ट्रैक्टर से उतरा और सीधे बिरजू और कमला के पैर छू लिए।

कमला की आँखों से आँसू बह निकले।
“बेटा… शहर छोड़ आया?”

अमित मुस्कुरा दिया।
“माँ, शहर तरक्की देता है… पर गाँव पहचान देता है।
और खेत… जीवन देना सिखाते हैं।”

बिरजू ने ट्रैक्टर पर हाथ फेरा।
आवाज़ काँप रही थी।
“इतना सब कैसे…?”

अमित बोला,
“अब मजदूरों की कमी नहीं होगी बाबूजी।
ये मशीन आधे समय में खेत तैयार कर देगी।
इस बार बुवाई समय पर होगी… और आप थोड़ा आराम भी करोगे।”

अगली सुबह।
सालों बाद बिरजू खेत में फिर मुस्कुराता हुआ चला।
आगे-आगे ट्रैक्टर, पीछे-पीछे पिता के थके मगर गर्व से भरे कदम।

मिट्टी पलट रही थी।
खेत जैसे फिर से साँस लेने लगा हो।

बिरजू रुका और बोला,
“बेटा… मेरी उम्र ढल गई, पर आज लग रहा है खेती अभी जिंदा है।”

अमित ने मुस्कुराकर कहा,
“बाबूजी, अब खेती नहीं रुकेगी।
हम दोनों मिलकर इसे फिर से सोना उगाएँगे।”

दूर तक फैले खेत, मिट्टी की खुशबू और पिता-पुत्र का साथ
जैसे धरती पर उम्मीद फिर से लौट आई हो।

“खेती नहीं मरी है, बस बेटों का लौटना बाकी है….”


Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back To Top