“पलास के फूलों की परंपरा”

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गाँव की गलियाँ होली के रंग में डूबी रहती थीं, जब चारों तरफ़ से ढोलक की धुन और होली के गीत गूंजते थे। 90 के दशक में होली की एक खास बात थी – यह त्योहार सिर्फ़ हंसी-खुशी का नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य और भाईचारे का प्रतीक भी था। उस समय की होली बस बाजार से खरीदे गए रंगों की होली नहीं थी, बल्कि यह त्योहार पूरी तरह से गाँव की धरती, उसके पेड़-पौधों और लोगों के बीच मौजूद एक अनकही समझ पर आधारित था।

बचपन की बात है। मैं और मेरे दोस्त होली से कुछ दिन पहले ही पलास के पेड़ों के पास जमा हो जाते थे। पलास के लाल-नारंगी फूल दूर से ही अपनी ओर खींच लेते थे, जैसे कि वे हमें होली के रंगों की याद दिला रहे हों। हम बड़े ध्यान से इन फूलों को तोड़ते और अपने साथ खेतों से घर ले जाते। बड़े से तबेले में पानी के साथ रखकर चूल्हे पर इन्हें धीमी आंच पर पकाया जाता। जैसे-जैसे रात बीतती, पानी का रंग गहरा होता जाता और सुबह होते-होते वह खूबसूरत लाल रंग बन जाता, जो हमारी होली की जान था।

गाँव में गुलाल के अलावा कोई और रंग का नाम नहीं जानता था। पलास के रंग से ही सब होली खेलते थे। हम बच्चे इसे अपने पूरे शरीर पर मल लेते, जैसे यह कोई अमूल्य धरोहर हो। पलास का रंग ना सिर्फ़ हमारी होली को रंगीन बनाता, बल्कि इसके साथ खेलने में जो खुशी होती थी, वह आज के किसी भी कृत्रिम रंग से ज्यादा थी। उस समय की होली सिर्फ़ रंगों की होली नहीं थी, बल्कि रिश्तों और भावनाओं की होली थी।

समय के साथ चीजें बदलने लगीं। जब मैंने पढ़ाई के लिए शहर जाना शुरू किया, तो वहाँ की होली ने मेरे मन में एक अजीब सी दूरी पैदा कर दी। होली अब बाजारू हो गई थी – तरह-तरह के चमकीले रंग, रसायनों से भरे हुए पिचकारियाँ और प्लास्टिक की पन्नियों में बंधे हुए रंग। यह सब देखकर मुझे गाँव की होली की याद आने लगी। वहाँ हर रंग का एक स्वाभाविक स्वाद होता था, जो सिर्फ़ प्रकृति से लिया गया था। अब तो हर चीज़ जैसे बाजार से खरीदने पर ही निर्भर हो गई थी। त्योहारों में से वह अपनापन, वह सादगी कहीं खोने लगी थी।

गाँव वापस लौटने के बाद भी मैंने देखा कि अब पलास के फूलों से होली खेलना लोग छोड़ चुके हैं। लोग अब दुकान से रंग खरीद लाते और एक-दूसरे पर फेंकते। मुझे यह सब देखकर कुछ खलने लगा। तब मैंने ठाना कि मैं फिर से पुरानी परंपरा को जीवित करूंगा। पिछले कुछ सालों से मैं होली के कुछ दिन पहले ही पलास के फूल तोड़कर लाता और उन्हें सुखाकर मिक्सर में पीसकर उसका गुलाल तैयार करता। यह गुलाल अब मेरे बच्चों के लिए होली का मुख्य रंग बन गया था। मैंने उन्हें बताया कि इस रंग में कोई रसायन नहीं है, यह पूरी तरह से प्राकृतिक है। इससे वे होली खेलते भी और होली के बाद उसी से अपना चेहरा भी धो लेते। यह गुलाल हमारे त्योहार को फिर से प्रकृति के करीब ले आया था।

मेरे बच्चे अब इस बात को समझने लगे थे कि होली सिर्फ़ बाजार के रंगों से खेलने का त्योहार नहीं है, बल्कि इसका असली मज़ा तब आता है जब हम इसे प्रकृति के साथ मिलकर मनाते हैं। पिछले दो साल से जब भी होली आती, मैं फिर से पलास के फूलों से हर्बल रंग बनाकर गाँव के बच्चों को देता और वे खुशी-खुशी इसे लेकर खेलते। उनके चेहरे पर वह चमक होती थी, जो शायद किसी भी बाजारू रंग से नहीं आ सकती थी।

गाँव के बड़े-बूढ़े अब भी हमारे इस प्रयास को देख मुस्कुराते और कहते, “यही है असली होली।” मैं जानता था कि यह छोटा सा बदलाव केवल मेरे लिए नहीं था, बल्कि यह आने वाली पीढ़ी के लिए भी था। पलास के फूलों से तैयार रंग सिर्फ़ एक परंपरा नहीं थी, यह गाँव की आत्मा थी, जो होली में घुल-मिल कर हमारे जीवन को रंगीन बना देती थी। यह रंग हमें याद दिलाते थे कि होली सिर्फ़ बाजारू चमक-धमक का त्योहार नहीं, बल्कि हमारी मिट्टी, हमारे पेड़-पौधों और हमारे रिश्तों की होली है।

वर्तमान में भी जब बाजार में तरह-तरह के रंग उपलब्ध हैं, मैं हर साल अपने पलास के फूलों को जमा करके हर्बल गुलाल तैयार करता हूँ। यह गुलाल न सिर्फ़ शरीर के लिए सुरक्षित होता है, बल्कि हमारी धरती, हमारी प्रकृति के लिए भी। अब जब मैं अपने बच्चों को इसे खेलते देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि हमने एक बार फिर उस पुरानी होली को जीवित कर लिया है – वह होली जो सिर्फ़ रंगों का खेल नहीं, बल्कि प्रकृति और भाईचारे का उत्सव है।
“असली होली तो पलास के रंगों की ही होली है।”


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