“जो आवाज़ हम नहीं सुनते, वो कभी-कभी काफ़ी देर बाद सुनाई देती है…”
“प्रकृति को नजरअंदाज करने की कीमत हमेशा चुकानी पड़ती है।”
दोपहर का वक्त था, ऑफिस में काम के बीच घिरा हुआ था। लंच का समय हो चुका था, लेकिन काम की व्यस्तता इतनी थी कि खाने का ख्याल भी नहीं आया। तभी मोबाइल की स्क्रीन पर ठाकुर साहब का नाम चमका। लैपटॉप पर आंखें गड़ाए, एक हाथ से कॉल रिसीव कर लिया।
उधर से आवाज़ आई— “भाई, कल ऑपरेशन है मेरा, इसलिए सोचा बात कर लूं…” आवाज़ में अजीब-सी मायूसी थी। अचानक सारा ध्यान काम से हटकर उनकी बातों पर चला गया।
“क्या हुआ ठाकुर भइया? आपकी आवाज़ कुछ ठीक नहीं लग रही!”
“भाई, तीन महीने से बेड रेस्ट पर हूँ, तुझे किसी ने बताया नहीं?”
“नहीं भइया, किसी ने कुछ नहीं बताया!”
फिर धीरे-धीरे उन्होंने बताया कि उन्हें आहार नली में कैंसर हुआ है और अगले दिन ऑपरेशन होना है। यह सुनकर दिमाग़ सुन्न पड़ गया। एक झटका-सा लगा। ठाकुर साहब और कैंसर?
दुख तो हुआ ही, लेकिन गुस्सा भी आया। कैंसर कोई अचानक नहीं होता, ये धीरे-धीरे पनपता है… और अक्सर हमारी अपनी ही गलतियों का नतीजा होता है। ठाकुर साहब की उम्र अभी सिर्फ़ 45 साल के आसपास होगी। एक 14 साल की बेटी, सरकारी नौकरी में पत्नी, एक बुजुर्ग माँ, और खुद प्राइवेट काम कर जैसे-तैसे घर चलाते थे। इतनी ज़िम्मेदारियों के बावजूद, उन्होंने अपने शरीर के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ कैसे कर लिया?
मन में पहला सवाल आया— क्या उनको आर्थिक मदद की ज़रूरत होगी? लेकिन फिर अपने हालात पर नज़र डाली— खुद ही कड़की में था। पर दिल ने कहा— ठाकुर साहब अकेले नहीं हैं, जो भी हो, मदद करनी होगी। अगले ही पल दिमाग़ ने दौड़ना शुरू किया— पैसे कहाँ से लाऊँ? किससे उधार लूँ? कैसे इंतज़ाम करूँ?
उधर से ठाकुर साहब ने कहा, “भाई, मुझे ब्लड डोनर चाहिए।” तभी ख़्याल आया— शायद पैसे न दे पाऊं, लेकिन रक्तदान तो कर ही सकता हूँ! यही एक मदद थी जो बिना किसी इंतज़ाम के तुरंत दी जा सकती थी। मैंने ऑफिस से समय निकालकर अस्पताल जाने का फैसला किया।
ठाकुर साहब को मैं 17 सालों से जानता था। जब पहली बार रायपुर आया था, तो उन्होंने गार्जियन की भूमिका निभाई थी। हर मुश्किल में साथ खड़े रहे। मगर उनकी एक आदत हमेशा खटकती थी— नशा। शराब, गुटखा, सिगरेट… ये सब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके थे। कितनी ही बार समझाया था— “भइया, छोड़ दो ये सब। घर-परिवार है, खुद का ख्याल रखना चाहिए!” लेकिन वो कुछ दिन छोड़ते, फिर लौट आते। शायद उन्हें लगता था कि ये सब उनके शरीर पर असर नहीं करेगा।
पर प्रकृति को नजरअंदाज करने की कीमत हमेशा चुकानी पड़ती है।
मैं अस्पताल पहुँचा, ब्लड टेस्ट करवाया, और जब सब ठीक निकला, तो रक्तदान किया। फिर सीधे ठाकुर साहब के वार्ड में गया। अंदर पहुँचा, तो देखा कि वो बेड पर लेटे हुए ब्लूटूथ से गाना सुन रहे थे।
कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा, फिर सोचा— उठाऊँ या नहीं? लेकिन फिर याद आया कि मुझे वापस ऑफिस भी जाना था। मजबूरी में उन्हें जगाया। मुझे देखकर वो मुस्कुराए, पर उनकी आँखों की मायूसी छिपी नहीं रह सकी।
“भाई, तू आया…?”
“भइया, आना तो बनता था!”
हमारी दस-पंद्रह मिनट की बातचीत हुई। मैंने उन्हें दिलासा दिया कि ऑपरेशन ठीक से हो जाएगा। कुछ देर बाद मैं वापस लौट आया। अगले दिन ऑपरेशन सफल रहा।
लेकिन असली सवाल अब खड़ा था— क्या ठाकुर साहब ने कुछ सीखा?
क्योंकि जो बात उनके परिवार ने, दोस्तों ने, और मैंने सालों तक समझाने की कोशिश की, वो बात अब डॉक्टरों ने लिखकर दे दी थी— “नशे से दूर रहो, वरना ज़िंदगी ख़त्म होने में देर नहीं लगेगी।”
हमारी चेतावनियों को वो हमेशा हंसी में टालते रहे, लेकिन अब प्रकृति ने उन्हें अपनी भाषा में समझा दिया था। अब विकल्प नहीं था— या तो संयम रखो, या फिर मौत की ओर बढ़ो।
शायद यही ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है— जो चेतावनी हम अनसुनी कर देते हैं, वो कभी-कभी इतनी देर से सुनाई देती है कि तब तक बहुत कुछ बदल चुका होता है।
नशे के बारे में मेरी कोई कट्टर विरोधी सोच नहीं है। मेरी राय सिर्फ इतनी है कि अगर आप खानदानी अमीर हैं, तो आप अपने नशे की कीमत चुका सकते हैं, लेकिन अगर नहीं, तो आपको नियंत्रित रहना सीखना होगा। अगर आपकी लापरवाही से परिवार पर आर्थिक बोझ पड़े, तो वह नशा आपकी निजी पसंद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से भागने का बहाना बन जाता है। और अगर आप खुद कंट्रोल नहीं कर सकते, तो प्रकृति अपने तरीके से कंट्रोल करना जानती है।
ठाकुर साहब अब ठीक हो रहे हैं, लेकिन यह लड़ाई सिर्फ उनके शरीर की नहीं, उनकी मानसिकता की भी है। क्या वे वाकई बदले हैं, या कुछ महीनों बाद फिर वही लापरवाही होगी?
यह सवाल केवल ठाकुर साहब के लिए नहीं, हम सबके लिए है।


बहुत बढ़िया