लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना©️
रात के साढ़े ग्यारह बजे थे।
शहर की ज्यादातर खिड़कियों में रोशनी बुझ चुकी थी, लेकिन निखिल के कमरे की खिड़की अब भी खुली थी। सामने सड़क पर आती-जाती गाड़ियों की रोशनी कमरे की दीवार पर कुछ पल के लिए चमकती और फिर अंधेरा पहले से थोड़ा गहरा हो जाता।
मोबाइल उसके हाथ में था।
स्क्रीन पर एक मैसेज खुला था-
“तुमसे एक बात कहनी है… लेकिन प्लीज़ मुझे जज मत करना।”
निखिल ने मैसेज पढ़ा और कुछ देर तक स्क्रीन को देखता रहा।
फिर उसने सिर्फ इतना लिखा-
“कहो… मैं सुन रहा हूँ।”
सामने से जवाब आने में लगभग दो मिनट लगे।
“सच में? कोई सलाह नहीं दोगे?”
निखिल मुस्कुराया।
“पहले पूरी बात सुनूँगा। सलाह की जरूरत होगी तो तुम खुद पूछ लेना।”
दूसरी तरफ बैठी रिया ने फोन को अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया।
कभी-कभी इंसान को समाधान नहीं चाहिए होता।
उसे सिर्फ कोई ऐसा चाहिए होता है जिसके सामने वह अपनी उलझन बिना डर के रख सके।
रिया और निखिल की दोस्ती कोई नई नहीं थी।
दोनों ने एक ही स्कूल में पढ़ाई की थी। आठवीं तक साथ पढ़े, फिर निखिल के पिता का तबादला हो गया और दोनों की दुनिया अलग-अलग दिशाओं में चली गई।
करीब बीस साल बाद एक पुराने स्कूल मित्र ने व्हाट्सऐप पर ग्रुप बनाया-

“हमारे स्कूल वाले दिन…”
बस वहीं से पुराने चेहरे फिर स्क्रीन पर लौट आए।
किसी ने अपनी शादी की तस्वीर डाली, किसी ने बच्चों की। कोई विदेश में था, कोई अपने शहर में व्यवसाय कर रहा था। किसी के बालों में सफेदी आ चुकी थी तो कोई अब भी अपनी स्कूल वाली तस्वीर देखकर लिख रहा था-
“यार, हम इतने बूढ़े कब हो गए?”
निखिल और रिया भी उसी ग्रुप में थे।
पहले सिर्फ गुड मॉर्निंग और पुराने फोटो पर हँसी-मजाक हुआ।
फिर एक दिन रिया ने निखिल को व्यक्तिगत मैसेज किया-
“तुम अभी भी इतने ही शांत हो या शादी ने बदल दिया?”
निखिल ने जवाब दिया-
“शादी ने बहुत कुछ बदला है, लेकिन सुनने की आदत अभी बची हुई है।”
रिया ने हँसते हुए लिखा-
“अच्छा है… आजकल सुनता कौन है?”
शायद यही वह वाक्य था जिससे उनकी पुरानी दोस्ती ने दूसरी जिंदगी शुरू की।
रिया अब 38 वर्ष की थी।
पति, दो बच्चे, नौकरी और बूढ़े होते माता-पिता-जिंदगी में सब कुछ था। बाहर से देखने पर वह एक व्यवस्थित जीवन जी रही थी।
निखिल भी 40 का हो चुका था। नौकरी, परिवार, बच्चों की पढ़ाई, घर की किश्तें और ऑफिस की जिम्मेदारियाँ-उसकी जिंदगी भी किसी दूसरे मध्यमवर्गीय व्यक्ति से अलग नहीं थी।
दोनों के पास समय कम था।
लेकिन बातचीत के लिए शायद मन में जगह बची हुई थी।
धीरे-धीरे रिया उससे अपनी छोटी-बड़ी बातें साझा करने लगी।
कभी ऑफिस में बॉस से हुई बहस।
कभी बेटे की पढ़ाई की चिंता।
कभी पति से हुई नाराजगी।
कभी माँ की तबीयत।
और कभी सिर्फ यह-
“आज पता नहीं क्यों मन खराब है।”
निखिल हर बार एक ही काम करता।
सुनता।
वह तुरंत फैसला नहीं सुनाता था।
वह यह नहीं कहता था-
“तुमने ही गलती की होगी।”
“तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
“तुम्हारे पति की जगह मैं होता तो…”
“तुम्हारी समस्या तो कुछ भी नहीं है, मेरी सुनो…”
वह बस पूछता-
“फिर क्या हुआ?”
और रिया बोलती चली जाती।
एक दिन रिया ने उससे कहा-
“निखिल, तुम जानते हो तुम्हारी सबसे अच्छी बात क्या है?”
“क्या?”
“तुम मेरी बात सुनते हो।”
निखिल हँस पड़ा।
“इतनी सी बात?”
रिया कुछ देर चुप रही।
फिर बोली-
“नहीं। आजकल यही सबसे बड़ी बात है।”
उसने कहा-
“लोगों के पास जवाब बहुत हैं, सुनने का समय नहीं। मैं किसी को अपनी परेशानी बताती हूँ तो वह मेरी समस्या समझने से पहले मुझे समझने लगता है।”
“मतलब?”
“मतलब… मेरी बात पूरी होने से पहले मेरे बारे में राय बना लेता है।”
निखिल चुप था।
रिया ने कहा-
“पिछले महीने ऑफिस में मेरे एक सहकर्मी से विवाद हुआ। मैंने एक दोस्त को बताया। उसने पूरी बात सुने बिना कहा-‘तुम थोड़ी ज्यादा संवेदनशील हो।’”
“फिर?”
“मैंने दूसरे दोस्त को बताया तो उसने कहा‘तुम्हें नौकरी बदल लेनी चाहिए।’”
“और?”
“तीसरे ने कहा-‘तुम्हारे अंदर एटीट्यूड आ गया है।’”
वह कुछ क्षण रुकी।
“किसी ने यह नहीं पूछा कि आखिर हुआ क्या था।”
निखिल ने धीरे से पूछा-
“और तुमने मुझे क्यों बताया?”
रिया ने लिखा-
“क्योंकि मुझे डर नहीं लगता कि तुम मेरी बात किसी और को बताओगे या मेरे बारे में कोई कहानी बना लोगे।”
कुछ महीनों बाद एक रात निखिल ने पहली बार रिया को मैसेज किया-
“आज मेरी बारी है।”
रिया ने तुरंत पूछा-
“क्या हुआ?”
निखिल ने लिखा-
“कुछ समझ नहीं आ रहा। लगता है मैं अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहा। ऑफिस में भी मन नहीं लगता। घर आता हूँ तो थका हुआ रहता हूँ। कभी-कभी लगता है कि मैं सबके लिए जिम्मेदार हूँ, लेकिन मेरे लिए कोई नहीं है।”
मैसेज भेजने के बाद निखिल कुछ देर फोन को देखता रहा।
उसे लगा शायद उसने ज्यादा कह दिया।
फिर रिया का जवाब आया
“तुम्हें कोई सलाह चाहिए?”
निखिल ने लिखा
“नहीं।”
कुछ सेकंड बाद जवाब आया-
“तो फिर बोलो… मैं सुन रही हूँ।”
निखिल की आँखें स्क्रीन पर टिक गईं।
उसे अचानक एहसास हुआ-
जिस चीज को वह इतने महीनों से रिया को दे रहा था, आज वही चीज उसे वापस मिल रही थी।
बिना निर्णय,
बिना उपदेश,
बिना किसी निष्कर्ष के।
सिर्फ सुनना।
आज हमारी जिंदगी शायद इसी जगह आकर अटक गई है।
पहले तीन घंटे की फिल्म देखने के लिए हम समय निकाल लेते थे। फिर टीवी आया तो विज्ञापनों के साथ चार घंटे बैठकर फिल्म देखी। आज पंद्रह सेकंड की रील भी लंबी लगती है।
हम स्क्रॉल करते हैं।
चेहरा देखते हैं।
एक सेकंड में पसंद या नापसंद तय करते हैं।
और धीरे-धीरे यही आदत रिश्तों में भी उतर आई है।
किसी की पूरी कहानी सुनने से पहले हम उसका चरित्र तय कर देते हैं।
किसी के एक फैसले से उसके पूरे व्यक्तित्व का फैसला कर देते हैं।
किसी की एक गलती देखकर उसके वर्षों के संघर्ष को भुला देते हैं।
और सबसे खतरनाक बात-
हम किसी की कही हुई निजी बात को उसके भरोसे की जगह अपनी बातचीत का विषय बना देते हैं।
हम श्रोता कम और निर्णायक ज्यादा होते जा रहे हैं।
एक दिन रिया ने निखिल से पूछा-
“अगर हमारी दोस्ती सोशल मीडिया पर दोबारा नहीं मिली होती तो?”
निखिल ने लिखा-
“शायद हम दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में अकेले ही बहुत कुछ सहते रहते।”
रिया ने पूछा
“क्या तुम्हें लगता है कि बिना मिले कोई अपना हो सकता है?”
निखिल ने जवाब दिया
“मिलना शरीरों का संबंध बनाता है, लेकिन समझना मन का।”
रिया कुछ देर तक उस वाक्य को देखती रही।
फिर उसने लिखा-
“शायद इसलिए कुछ अजनबी अपनों से ज्यादा अपने लगते हैं।”
निखिल ने फोन रख दिया।
उस रात उसे स्कूल का वह पुराना दिन याद आया जब रिया उसके साथ बैठकर अपना टिफिन बाँटा करती थी।
बीस साल पहले भी वह उसकी बात सुनती थी।
बीस साल बाद भी सुन रही थी।
बस फर्क इतना था कि तब दोनों एक ही बेंच पर बैठते थे और अब दो अलग-अलग शहरों में बैठकर एक-दूसरे की स्क्रीन पर मौजूद थे।
समय बदल गया था।
तकनीक बदल गई थी।
रिश्तों का तरीका बदल गया था।
लेकिन इंसान की एक जरूरत नहीं बदली
उसे कोई ऐसा चाहिए जो उसकी बात पूरी होने तक उसे बीच में रोककर उसका फैसला न सुनाए।
शायद हमारे जीवन में भी कोई निखिल है।
या कोई रिया।
शायद कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे हम कभी मिले नहीं, लेकिन जिसके सामने हमने अपनी सबसे छिपी हुई बात कह दी।
शायद कोई ऐसा दोस्त है जिसे हमने अपनी जिंदगी का कोई राज बताया और उसने उसे अपने तक ही रखा।
और शायद हम भी किसी की जिंदगी में वही व्यक्ति हैं-जिसके पास कोई बिना डरे अपनी बात कह सकता है।
अगर ऐसा है तो समझिए, आपके पास कोई साधारण दोस्त नहीं है।
आपके पास भरोसे का एक सुरक्षित ठिकाना है।
और आज के इस तेज भागते समय में इससे कीमती रिश्ता शायद कोई दूसरा नहीं।
क्योंकि हर समस्या का समाधान जरूरी नहीं कि हमारे पास हो।
हर सवाल का जवाब भी हमारे पास नहीं हो सकता।
लेकिन किसी टूटते हुए इंसान के पास बैठकर इतना कहना
“तुम बोलो… मैं तुम्हें जज नहीं करूँगा।”
कई बार यही सबसे बड़ी मदद होती है।
और सच कहें तो दुनिया को आज सलाह देने वालों से ज्यादा
सुनने वालों की जरूरत है।

अच्छा और 100% सच लिखा है। आज लोग छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे को जज करने लग जाते हैं। बजाय उन्हें समझने के उनके लिए राय बना लेते हैं और पीठ पीछे उनके बारे में उन्ही राय को लेकर बात करने लगते हैं।
हाँ दीदी धन्यवाद