लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
कल्पना कीजिए…
अगर आपको अपने ही गाँव से, अपने ही समाज से बेदखल कर दिया जाए।
लोग आपसे बात करना बंद कर दें, आपके घर का हुक्का–पानी बंद कर दिया जाए, कोई लेन-देन न रखे, न सुख-दुख में कोई साथ खड़ा हो-तो आप क्या करेंगे?
यह केवल एक सामाजिक दंड नहीं होता, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व पर सबसे गहरी चोट होती है। क्योंकि मनुष्य अकेले जीने के लिए नहीं बना। मनुष्य मूलतः एक सामाजिक प्राणी है-जो रिश्तों, संबंधों और संवाद के धागों से बुने हुए समाज में ही अपना अर्थ पाता है।
मनुष्य के जीवन में परिवार, मित्र, नाते-रिश्तेदार और समाज-ये सब केवल शब्द नहीं, बल्कि उसके जीवन के आधार होते हैं। यदि कोई व्यक्ति इन सब संबंधों से अलग होकर एकांत में जीवन जी रहा हो, तो वह सामान्य जीवन से बहुत दूर चला जाता है। समाज से कटकर रहना मनुष्य के लिए सहज नहीं है। यही कारण है कि इतिहास में भी जो लोग समाज से दूर रहते थे, उन्हें या तो साधु माना गया, या फिर समाज से भटका हुआ व्यक्ति।

गाँवों में आज भी सामाजिक जीवन की एक अलग ही संरचना दिखाई देती है। वहाँ समाज केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक जीवंत व्यवस्था है। गाँव में हर व्यक्ति किसी-न-किसी रिश्ते में जुड़ा होता है-कोई भाई है, कोई चाचा है, कोई दादा है, कोई भतीजा।
वहाँ संबंध केवल खून के नहीं होते, बल्कि अपनत्व के होते हैं।
इसी सामाजिक व्यवस्था के भीतर एक पुरानी परंपरा भी रही है-सामाजिक दंड की परंपरा।
यदि किसी व्यक्ति या परिवार द्वारा ऐसा कृत्य किया जाता है जो समाज की परंपराओं या मान्यताओं के विरुद्ध माना जाता है-जैसे किसी अन्य समाज में विवाह कर लेना, किसी प्रेम प्रसंग के कारण घर से भाग जाना, या ऐसा व्यवहार करना जिससे समाज की प्रतिष्ठा पर प्रश्न उठे-तो समाज की बैठक होती है।
उस बैठक में समाज के बुज़ुर्ग और प्रमुख लोग मिलकर निर्णय लेते हैं। कई बार उस परिवार पर दंड लगाया जाता है- जैसे पूरे समाज को भोज देना, जिसे कई स्थानों पर “बकरा–भात” की परंपरा कहा जाता था, या आर्थिक दंड देना।
और यदि कोई परिवार उस दंड को स्वीकार नहीं करता, तो उसके लिए सबसे कठोर दंड होता था हुक्का–पानी बंद।
हुक्का–पानी बंद होने का अर्थ था कि समाज उस परिवार से पूरी तरह संबंध तोड़ लेगा।
कोई बात नहीं करेगा, कोई लेन-देन नहीं होगा, न कोई उनके घर आएगा, न उन्हें अपने घर बुलाएगा।
यह दंड जितना सरल शब्दों में लगता है, उतना ही पीड़ादायक होता है।
क्योंकि समाज से अलग होना मनुष्य के लिए सबसे बड़ी सज़ा होती है।
इसीलिए गाँवों में सामाजिक एकता का महत्व बहुत बड़ा रहा है।
यदि समाज में आपका सम्मान है, लोग आपके साथ बैठते हैं, आपके सुख-दुख में शामिल होते हैं तो इसका अर्थ है कि आप एक सम्मानित व्यक्ति हैं।
और यदि समाज से आपका उठना-बैठना ही नहीं है, तो मानो आपका अस्तित्व अधूरा है।
गाँव का जीवन इसी सामूहिकता पर टिका हुआ है।
जब किसी घर में कोई परेशानी आती है, तो पूरा मोहल्ला साथ खड़ा होता है।
कभी घर में सब्ज़ी मनपसंद न बनी हो, तो पड़ोसी के घर से मांग ली जाती है।
किसी के यहाँ शादी हो, तो पूरा गाँव मेहमान बन जाता है।
वहाँ आज भी वस्तु विनिमय और सहयोग की संस्कृति जीवित है।
इसीलिए कहा जाता है कि गाँव भले आर्थिक रूप से गरीब हो, पर दिल से सबसे अमीर वहीं के लोग होते हैं।
अब यदि हम शहरों की ओर देखें, तो वहाँ सामाजिक जीवन की तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
कानूनी दृष्टि से देखें तो किसी व्यक्ति या परिवार को समाज से बेदखल करना एक आपराधिक मामला माना जा सकता है। भारत का संविधान हर नागरिक को स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार देता है। कोई भी व्यक्ति या समूह कानून से ऊपर नहीं है।
परंतु एक सच्चाई यह भी है कि मनुष्य केवल कानून से नहीं, बल्कि भावनाओं से भी जीता है।
समाज से अलग होकर रहना उसे मानसिक रूप से कमजोर कर सकता है।
इसीलिए वह किसी-न-किसी रूप में समाज से जुड़कर रहना चाहता है-चाहे त्योहारों में शामिल होकर, आयोजनों में भाग लेकर या मित्रों के साथ समय बिताकर।
लेकिन शहरी जीवन में यह जुड़ाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।
आज महानगरों और शहरों में एक नई संस्कृति विकसित हो रही है एकल जीवन की संस्कृति।
लोग अपने छोटे-से परिवार या अकेलेपन में जीना सीख रहे हैं।
पड़ोसी एक ही इमारत में रहते हैं, पर एक-दूसरे को ठीक से जानते तक नहीं।
किसी के घर सुख हो या दुख-अक्सर वह केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।
इक्कीसवीं सदी में डिजिटल दुनिया का प्रभाव भी इस दूरी को और बढ़ा रहा है।
आज हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन है और लगभग हर व्यक्ति किसी-न-किसी व्हाट्सऐप समूह का हिस्सा है-कार्यालय का समूह, मित्रों का समूह, कॉलोनी का समूह, विद्यालय या कॉलेज का समूह।
लेकिन यह विडंबना ही है कि जहाँ डिजिटल समूह बढ़ते जा रहे हैं, वहीं वास्तविक सामाजिक संबंध कमजोर होते जा रहे हैं।
कई बार ऐसा भी होता है कि एक ही कॉलोनी में रहने वाले लोग एक-दूसरे को केवल व्हाट्सऐप संदेशों के माध्यम से जानते हैं, व्यक्तिगत रूप से नहीं।
और यदि किसी कारण से किसी व्यक्ति या परिवार को समाज से अलग भी कर दिया जाए, तो शायद आज बहुत लोगों को उसका उतना दर्द महसूस भी न हो।
क्योंकि हमारे भीतर धीरे-धीरे अहम और आत्मकेंद्रितता ने जगह बना ली है।
हम सोचने लगे हैं
“उसने मेरे साथ ऐसा किया …”
“उससे मुझे कोई लाभ नहीं…”
“मुझे उससे क्या लेना-देना…”
इन्हीं विचारों के साथ हम धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।
प्रकृति ने मनुष्य को जिस सामाजिक वातावरण के लिए बनाया है, उसमें परिवार, समाज और रिश्तों की उपस्थिति आवश्यक है।
मनुष्य को ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जिनसे वह अपने मन की बात कह सके, अपने सुख-दुख साझा कर सके।
क्योंकि जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नाम नहीं है, बल्कि साझा भावनाओं का भी नाम है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि गाँव बेहतर हैं या शहर।
प्रश्न यह है कि क्या हम अपने भीतर समाज की भावना को बचाए रख पा रहे हैं?
यदि हम संबंधों को केवल औपचारिकता में बदल देंगे,
यदि पड़ोसी केवल नाम के रह जाएँगे,
यदि समाज केवल व्हाट्सऐप समूह तक सीमित रह जाएगा
तो कहीं न कहीं हम अपनी मानवीय पहचान खो देंगे।
मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसकी सामाजिकता है।
और शायद यही कारण है कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति धन नहीं, बल्कि संबंध होते हैं।
क्योंकि अंततः मनुष्य को जीने के लिए केवल घर नहीं चाहिए
उसे अपनापन भी चाहिए।

इसके दो पहलू हैं… एक लगता है कि लोग दूर हो रहे हैं लेकिन दूसरा पहलू ये है कि अब मजबूरी नहीं रही जबरन किसी तरह के बंधन में बंधे रहने की लोग अब सिर्फ अपनी परवाह कर पा रहे हैं… खुद को समाज से ज्यादा प्राथमिकता दे पा रहे हैं और यही समाज को बुरा भी लगता है उन्हें लगता है उनकी व्यवस्था टूट रही है
बहुत बढ़िया