लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वह पहले कभी इतनी भरी हुई नहीं थी।
हाथों में मोबाइल, कानों में ईयरफोन, आँखों में स्क्रीन और मन में अनगिनत सूचनाएँ।
हर पल कुछ न कुछ चल रहा है-मैसेज, कॉल, नोटिफिकेशन, खबरें, रीलें, मीम्स।
लेकिन इसी शोर के बीच एक चीज़ सबसे ज़्यादा बढ़ रही है
चुप्पी।
यह अजीब विरोधाभास है।
बातें बहुत हैं, संवाद कम है।
कनेक्शन बहुत हैं, संबंध कम हैं।
भीड़ बहुत है, पर अपनापन कम होता जा रहा है।
पहले लोग मिलते थे तो हालचाल पूछते थे।
अब स्टेटस देखकर समझ लेते हैं
“हाँ, ज़िंदा है।”

चुप्पी का नया अर्थ
चुप्पी पहले सुकून होती थी।
आज वह थकान है।
पहले मौन साधना थी।
आज मौन उपेक्षा है।
घर में पिता अख़बार पढ़ते हैं,
माँ टीवी देखती है,
बच्चा मोबाइल में खोया रहता है।
सब साथ बैठते हैं,
पर कोई साथ नहीं होता।
किसी को किसी की आँखों में देखने की फुर्सत नहीं।
हम खुद से भी दूर हो गए हैं
सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि हम दूसरों से नहीं बात कर रहे,
संकट यह है कि हम खुद से भी नहीं बात कर रहे।
हम पूछते नहीं
मैं खुश हूँ या बस व्यस्त हूँ?
मैं जी रहा हूँ या निभा रहा हूँ?
मैं चाहता क्या हूँ या जो मिल रहा है वही स्वीकार कर रहा हूँ?
हमने अपने भीतर झाँकना बंद कर दिया है,
क्योंकि भीतर झाँकने से सवाल पैदा होते हैं,
और सवाल हमें असहज करते हैं।
इसलिए हम शोर में रहते हैं,
ताकि खुद की आवाज़ न सुननी पड़े।
रिश्तों की चुप्पी
आज सबसे ज़्यादा चुप्पी रिश्तों में है।
पति-पत्नी साथ रहते हैं,
पर बात सिर्फ ज़रूरत की होती है
बिल, बच्चों की फीस, सब्ज़ी, दवा।
दोस्त साथ बैठते हैं,
पर सब अपने-अपने फोन में।
माँ-बाप अपने बच्चों को देखते हैं,
पर कुछ कह नहीं पाते क्यूँकि बच्चे अपने में ही खोयें हैं।
सब कुछ है,
पर “सुनने वाला” कोई नहीं।
चुप्पी जब ज़हर बन जाती है
कुछ चुप्पियाँ ज़रूरी होती हैं,
पर कुछ चुप्पियाँ धीरे-धीरे ज़हर बन जाती हैं।
जब दुख कहे नहीं जाते,
तो वे भीतर सड़ते हैं।
जब सवाल पूछे नहीं जाते,
तो वे दीवार बन जाते हैं।
जब प्रेम जताया नहीं जाता,
तो वह आदत बन जाता है।
और जब आदमी रो नहीं पाता,
तो वह पत्थर बन जाता है।
क्या हल है?
हल बहुत बड़ा नहीं है।
हल बस इतना है
रुकना।
दिन में कुछ पल बिना स्क्रीन के बैठना।
किसी अपने से आँख मिलाकर बात करना।
खुद से पूछना
“मैं कैसा हूँ?”
किसी दोस्त को बिना वजह फोन करना।
माँ से पूछना
“आज थकी तो नहीं?”
बच्चे से पूछना
“तुझे क्या अच्छा लगता है?”
चुप्पी को तोड़ना,
पर शोर से नहीं
संवेदना से।
चुप्पी भी बोलती है
हर चुप्पी खाली नहीं होती।
कुछ चुप्पियाँ गहरी होती हैं।
कुछ मौन में पूरा संसार होता है।
मगर जब चुप्पी मजबूरी बन जाए,
तो वह रिश्तों को खा जाती है।
हमें फिर से सीखना होगा
सुनना।
महसूस करना।
और कहना
“मैं हूँ तुम्हारे साथ।”
अंतिम बात
हम समय की दौड़ में बहुत आगे निकल गए हैं,
पर इंसान होना पीछे छूट गया है।
अगर हमने चुप्पी का शोर नहीं सुना,
तो एक दिन ऐसा आएगा
कि हमारे पास सब कुछ होगा
पर कोई नहीं होगा।
इसलिए आज ही…
किसी अपने से बात करिए।
खुद से भी।
क्योंकि
जो बोल नहीं पाते, वही सबसे ज़्यादा टूटते हैं।

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