लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
3 दिसंबर को नवा रायपुर स्थित शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुकाबले का गवाह बनेगा—जब भारत और दक्षिण अफ्रीका की टीमें यहां आमने-सामने होंगी। यह वही स्टेडियम है जिसका उद्घाटन 11 सितंबर 2008 में हुआ था, और जो अपने पहले अन्तरराष्ट्रीय मैच के लिए प्रदेश के क्रिकेट प्रेमियों से लगभग एक दशक का लंबा इंतजार ले चुका है।
लेकिन इस स्टेडियम की कहानी सिर्फ क्रिकेट या इमारतों की कहानी नहीं-यह उस छत्तीसगढ़ की यात्रा है, जिसे हमने अपनी आँखों से बदला हुआ देखा है।
मेरी स्मृति में बसा वह दिन-11 सितंबर 2008

उसी साल, उद्घाटन के समय का मेरा एक अनुभव आज भी जस का तस याद है।
11 सितंबर 2008, दोपहर 3 बजे मैं IGKV जोरा से रायपुर रेलवे स्टेशन जाने के लिए ऑटो में बैठा था।
जोरा से तेलीबांधा थाना चौक तक की वह सड़क तब बिना डिवाइडर वाली, टूटी-फूटी, धूल उड़ाती डबल लेन-
उस दिन लोगों की भीड़ और जाम के कारण जैसे ठहरा हुआ शहर बन चुकी थी।
ऑटो में बैठा मैं बार-बार घड़ी देख रहा था…
अकलतरा की ट्रेन पकड़नी थी, लेकिन सड़क मानो कह रही थी-
“आज नहीं जाने दूँगी।”
तीन घंटे…
हाँ, पूरा तीन घंटे सिर्फ जोरा से तेलीबांधा चौक पहुँचने में लगे।
पूरा शहर एक ही दिशा में बह रहा था—उसी नये बने स्टेडियम की तरफ,
जिसकी 65 हज़ार दर्शक क्षमता और भव्यता पहली बार लोगों के सामने थी।
हर चौराहे पर उत्साह, हर मोड़ पर भीड़… मानो छत्तीसगढ़ पहली बार अपना सपना साकार होते देख रहा हो।
वह मेरा व्यक्तिगत अनुभव ही नहीं था-
वह उस दौर की पूरी अधोसंरचना की सच्चाई भी था।
जब सड़कें संघर्ष थीं, आज उसी राह पर रोशनी दौड़ती है
तब नवा रायपुर दूर, वीरान और “भविष्य का शहर” कहकर टाल दिया जाता था।
आज वही क्षेत्र चौड़ी, नई, डिवाइडर युक्त, चमचमाती सड़कों के साथ राजधानी का आधुनिक चेहरा बन चुका है।
जहाँ कभी टूटी सड़कों पर जाम था, आज वहीं से टीम इंडिया की बसें सीधी स्टेडियम तक सरपट दौड़ती हैं।
जहाँ कभी मैच की चर्चा भी मुश्किल थी, आज अंतरराष्ट्रीय मुकाबले प्रदेश की पहचान हैं।
3 दिसंबर का मैच-एक खेल नहीं, एक पूरी यात्रा का उत्सव
भारत और दक्षिण अफ्रीका की टीमें जब एक ही चार्टर्ड फ्लाइट से रायपुर उतरेंगी,
जब विराट–रोहित–जैसवाल इस मैदान पर उतरेंगे,
तो यह सिर्फ एक मैच नहीं होगा—
बल्कि उस बदलते छत्तीसगढ़ का प्रमाणपत्र होगा, जिसे हमने अपने संघर्षों, यादों और इंतज़ारों में जिया है।
एक समय था जब स्टेडियम बना भी था, पर अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं थे।
आज ऐसा समय है जब स्टेडियम मैचों से जगमगा रहा है, और पूरा प्रदेश गर्व से कहता है-
“हमने लंबा सफर तय किया है-अब हम विश्वस्तरीय मेजबान हैं।”
