लेखक: एम बलवंत सिंह खन्ना
सादर नमन उस धरती को, जिसने सत्य, संतुलन और संवाद को हमेशा जीवन का मूल माना- छत्तीसगढ़।
यह वही भूमि है जहाँ संत बाबा गुरु घासीदास जी ने जन्म लेकर मनखे-मनखे एक समान का संदेश दिया; जहाँ शहीद वीर नारायण सिंह ने अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई; जहाँ डॉक्टर खुबचंद बघेल और वीर गुंडाधुर ने जनमानस को सम्मान, अधिकार और चेतना का मार्ग दिखाया।
यह प्रदेश सिर्फ़ भौगोलिक सीमा नहीं- यह संस्कृति है, यह संवेदनशीलता है, यह अपनापन है, यह मातृत्व है।

छत्तीसगढ़ उन कुछ क्षेत्रों में से है जहाँ “मातृभूमि” को सचमुच मातृ रूप से पूजा जाता है- छत्तीसगढ़ महतारी के रूप में। यही वह भाव है, जिसने इस प्रदेश में यात्रियों को घर, परदेशियों को परिवार और समाजों को सम्मान देना सिखाया। यहाँ व्यापार के लिए आए लोग छत्तीसगढ़ में ही बस जाना गर्व महसूस करते हैं और इसी में छत्तीसगढ़ की आत्मा बसती है।
पर पिछले सप्ताह से घट रही घटनाओं ने इस शांति और संस्कृति को कंपा दिया।
रायपुर के तेलीबाँधा, वीआईपी रोड चौक- जहाँ से मुख्यमंत्री, मंत्री और अधिकारी रोज़ गुजरते हैं- वहाँ स्थापित छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा का विच्छेदन हो गया। कई दिनों तक किसी को जानकारी तक न मिली।
जब खबर सामने आई, छत्तीसगढ़िया समाज के भीतर आक्रोश फूट पड़ा जोकि स्वाभाविक था।
अस्मिता पर चोट सिर्फ़ प्रतिमा पर प्रहार नहीं- एक आत्मा पर आघात है।
रोते हुए लोग, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के कारण प्रशासन द्वारा रातों-रात दूसरी प्रतिमा का स्थापित होना फिर पुलिस प्रशासन द्वारा एक मंदबुद्धि अपराधी को पकड़ना यह घटना अपने आप में कई सवाल छोड़ गई।
क्या हमारी सादगी को कमजोरी समझ लिया गया है?
क्या छत्तीसगढ़ की सहनशीलता को “कुछ भी कर लो, आवाज़ नहीं उठेगी” समझा जा रहा है?
इसी बीच, सांस्कृतिक पहचान को लेकर हुए विवादों में भाषाएँ, समाज और व्यक्तित्व चर्चा में आए।
छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना द्वारा उठाए गए सवालों पर अग्रवाल और सिंधी समाजों की तीखी प्रतिक्रियाएँ, गिरफ्तारी की माँगें, और फिर रायगढ़ के सिंधी समाज के नशेड़ी युवा विजय राजपूत द्वारा ऑन-कैमरा बाबा गुरुघासीदास पर अपशब्द कहते हुए अपमान ये सब घटनाएँ किसी सभ्य प्रदेश की पहचान नहीं होनी चाहिए।
यह संघर्ष “छत्तीसगढ़िया बनाम बाहरी” नहीं है।
यह संघर्ष सम्मान बनाम अहंकार, संस्कृति बनाम अपमान, और संवाद बनाम उकसावे का है।
छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना द्वारा 31 अक्तूबर को रायपुर बंद का आव्हान किया गया है। सवाल यह नहीं कि कौन रैली में जाएगा और कौन नहीं।
सवाल यह है कि हम सब अपने दिल में किसके साथ खड़े हैं?

हमारा इतिहास गवाह है- छत्तीसगढ़ संघर्ष करता है, लेकिन हिंसा से नहीं, समझदारी से।
यहाँ युद्ध भी होते हैं तो जनहित, आत्मसम्मान और समानता के लिए।
पर आज आवश्यकता केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि सचेत नागरिकता और उत्तरदायी संवाद की भी है।
क्योंकि जो प्रदेश बाबा गुरु घासीदास और महान विभूतियों की धरती है, वहाँ घृणा का फूल नहीं खिल सकता।
छत्तीसगढ़ की आत्मा
छत्तीसगढ़ को कोई तोड़ नहीं सकता-पर हम खुद अगर क्रोध, जल्दबाजी और भ्रम में आए, तो चोट हम खुद को भी पहुँचाएँगे।
देखा नहीं?
महतारी की प्रतिमा टूटी-लेकिन असल टूटन हमारी आत्मा में हुई।
अब समय है:
एक साथ खड़े होने का, तोड़ने का नहीं।
संवाद का, उग्रता का नहीं ।
गर्व का, घमंड का नहीं।
हमारी विरासत सिखाती है—
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया”
यह वाक्य सिर्फ़ नारा नहीं- यह जीवन दर्शन है।
आखिर में…
इस धरती ने हमको अपनाया है।
अब हमारी बारी है इस धरती का मान रखने की।
अपनों से लड़ाई नहीं- अपने होने की घोषणा चाहिए।
और असली घोषणा क्या है?
सम्मान, समझ, संवेदनशीलता, समानता और सत्य।
चलो मिलकर कहें—
हम छत्तीसगढ़िया हैं, सादगी हमारी शक्ति है, कमजोरी नहीं।
जय जोहार।
छत्तीसगढ़ महतारी की जय।
