“भटकी पीढ़ी और शिक्षा की खोती विरासत”
करीब पंद्रह-बीस साल पहले की बात है, जब गाँव की गली में हमारे छोटे दादा जी का आना किसी सन्नाटे से कम नहीं होता था। वह जब भी पैदल चलते, उनके मजबूत कदमों की आहट सुनकर हम बच्चे छिप जाते। उनकी उपस्थिति ही हमें अनुशासन का पाठ पढ़ा देती थी। धोती-कुर्ते में सादगी की मूरत, दादा जी का व्यक्तित्व रौबदार था। लेकिन उनके इस सख्त स्वभाव के पीछे जो बात सबसे गहरी थी, वह थी शिक्षा के प्रति उनका अनन्य प्रेम और दृढ़ विश्वास।
दादा जी हमेशा कहा करते थे, “बेटा, ज़मीन-जायदाद का हिस्सा हो सकता है, बँटवारा हो सकता है, लेकिन विद्या का बँटवारा न कभी हुआ है, न कभी हो सकता है।” उनका यह वाक्य आज भी मेरे मन-मस्तिष्क में गूंजता है। उन्होंने हमें सिखाया कि पढ़ाई ही सच्ची संपत्ति है। दादा जी की इस बात ने हमारे परिवार में ही नहीं, गाँव के हर घर में शिक्षा का महत्व बढ़ाया। उनका मानना था कि चाहे संपत्ति कुछ भी हो, अगर शिक्षा आपके पास है, तो वही आपकी असली पूंजी है।
गाँव के बच्चों को बेवजह गली में खेलता देख, दादा जी नाराज़ हो जाते। वह बच्चों को अक्सर डाँटते थे, “बेटा, खेल कूद ठीक है, लेकिन पढ़ाई सबसे ज़रूरी है।” उनकी इस सख्ती से हम बच्चे उनके सामने गलतियाँ करने से डरते थे। लेकिन, उनके इसी अनुशासन के कारण आज हम सब एक बेहतर मुकाम पर हैं। चाहे गाँव के कितने भी बच्चे क्यों न हों, दादा जी ने सभी को विद्या की इस धरोहर का महत्व सिखाया।
पिछले साल 86 साल की उम्र में दादा जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन उनका एक-एक शब्द, उनकी सीख, उनकी धरोहर हम सभी के दिलों में आज भी जिंदा है। अगले माह उनकी पुण्यतिथि आने वाली है उस दिन फिर से उनकी यादें, उनके साथ बिताए गए पल, फिर से ताज़ा हो जाएंगे।
आज जब मैं अपने गाँव की वर्तमान स्थिति को देखता हूँ, तो दादा जी की बातें मुझे बार-बार याद आती हैं। मैं अब अपने परिवार के साथ शहर में बस चुका हूँ, लेकिन हर तीज-त्योहार या पारिवारिक समारोह में गाँव से जुड़ने का एक अलग ही आनंद है। लेकिन पिछले कुछ सालों से गाँव का हाल देखकर मन बेचैन हो जाता है।
गाँव के बच्चे, जो कभी दादा जी की डाँट से डरकर पढ़ाई करते थे, अब गुटखा-शराब और मोबाइल की लत में डूब चुके हैं। गली में लापरवाही से गाड़ी चलाते, कानफोड़ साइलेंसरों का शोर मचाते, उन बच्चों के शरीर में दम नहीं बचा है। उनके चेहरे और व्यवहार में ऐसी लापरवाही दिखाई देती है जैसे उन्हें भविष्य की कोई चिंता ही नहीं है।
इनके जीवन में पढ़ाई का नामोनिशान नहीं है। चोरी, मारपीट, और अन्य बुरी आदतों में लिप्त ये बच्चे गाँव के भविष्य को धूमिल कर रहे हैं। जब मैं इन बच्चों को देखता हूँ, तो गाँव की पुरानी यादों के साथ-साथ दादा जी की वह शिक्षाएँ भी सामने आ जाती हैं।
मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग शिक्षा में सहायक हो सकता है, लेकिन इसने एक अंधकारपूर्ण राह भी खोली है, जिसमें हमारे गाँव के नाबालिग बच्चे उलझकर रह गए हैं। यह चिंता का विषय है कि अभिभावक, जो कभी बच्चों के भविष्य के लिए चिंतित रहते थे, अब उन पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
गाँव का समाज धीरे-धीरे बिखरता जा रहा है। छोटे-छोटे गाँव के बच्चों के पास कोई मार्गदर्शन नहीं है, जो उन्हें सही दिशा दिखा सके। ऐसा लगता है जैसे दादा जी जैसे लोग अब बचे ही नहीं, जो इन्हें फिर से अनुशासन में ला सकें, शिक्षा के प्रति जागरूक कर सकें।
दादा जी की एक बात हमेशा मेरे दिल में रहती है – “बेटा, विद्या का बँटवारा नहीं हो सकता।” यह सच्चाई हमें समझनी होगी। चाहे अमीर हो या गरीब, विद्या ही एक ऐसी चीज़ है जो इंसान को सच्चा धनवान बनाती है। लेकिन आज के समय में इस मूल्यवान सच्चाई को हमने खो दिया है।
आज के बच्चों में वह सम्मान, वह आदर नहीं दिखता जो हमने अपने बड़ों के प्रति दिखाया था। अगर कोई बुजुर्ग उन्हें समझाने की कोशिश भी करें, तो ये बच्चे उल्टा जवाब देने लगते हैं। इस बदलाव ने गाँव के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है।

समाज को फिर से जागरूक होना होगा। हमें फिर से दादा जी की तरह सोचने वाले लोग चाहिए, जो बच्चों को सही मार्गदर्शन दें और उन्हें बताएँ कि शिक्षा ही सच्ची धरोहर है। अगर हम यह संदेश नहीं फैला सके, तो हमारा भविष्य अनिश्चित ही रहेगा।
दादा जी के जाने के बाद से गाँव में वह अनुशासन देखने को नहीं मिलता है। अब समय आ गया है कि हम उस धरोहर को फिर से जीवित करें। अगर हम अब भी शिक्षा का महत्व नहीं समझ पाए, तो भविष्य अंधकारमय ही होगा।
गाँव में अब वैसे दादा जी तो नहीं हैं, लेकिन उनके दिए हुए संदेश को हम आगे बढ़ा सकते हैं। हमें बच्चों को यह सिखाना होगा कि शिक्षा से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं है। जिस तरह से दादा जी ने हमें सिखाया था, उसी तरह हमें आने वाली पीढ़ियों को सिखाना होगा।
क्योंकि विद्या ही वह धरोहर है, जिसका बँटवारा न कभी हुआ है, न कभी होगा।


बहुत बढ़िया