छत्तीसगढ़ के छोटे से गाँव रसौटा में चुनावी माहौल गर्म था। गाँव की गलियों में रोज़ चर्चाएँ होतीं, जनसभाएँ होतीं, और प्रत्याशी अपने-अपने समर्थकों के साथ घर-घर जाकर समर्थन मांग रहे थे। हर किसी के चेहरे पर उम्मीद और उत्साह झलक रहा था। पंचायत चुनाव नज़दीक थे, और गाँव के लोग बड़ी दिलचस्पी के साथ अपने भावी नेतृत्व को चुनने की तैयारियों में जुटे थे। इस सब के बीच गाँव का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, शिवराम , जो अब 85 साल के हो चुके थे, चौपाल के पास बैठकर इस पूरे दृश्य को देखकर मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने अपने जीवन के कई दौर देखे थे—गाँव की पुरानी जमींदारी व्यवस्था, पंचायत चुनावों की शुरुआत, और अब यह वर्तमान माहौल। शिवराम जी के लिए यह एक ऐसा अवसर था, जब वे अपने अनुभवों को ताजगी के साथ याद कर सकते थे।

जब शिवराम जी युवा थे, तब रसौटा और उसके आसपास के गाँवों में जमींदारी का राज था। गाँव का हर फैसला गाँव के ज़मींदार के घर से होता था। खेती-बाड़ी से लेकर छोटे-मोटे विवादों तक हर चीज़ पर ज़मींदार की नज़र रहती थी। किसानों की हालत मुश्किल थी—कड़ी मेहनत के बावजूद कर्ज़ का बोझ सिर पर मंडराता रहता। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का नामो-निशान भी नहीं था। गाँव के बच्चे या तो खेतों में काम करते या फिर ज़मींदार के घर की सेवा करते थे। विकास योजनाएँ सिर्फ कागजों में सिमटी रहती थीं, और लोग गाँव के बाहर की दुनिया से कटे हुए थे।
लेकिन 24 अप्रैल 1993 को भारत में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए संविधान (73वां संशोधन) अधिनियम 1992 लागू हुआ तब एक ऐसा बदलाव आया, जिसने गाँव के हालात को बदलकर रख दिया। संविधान के 73वें संशोधन के तहत पंचायती राज अधिनियम को लागू किया गया। यह बदलाव राजीव गांधी की पहल थी, जो गाँवों के लोगों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से लाया गया था। शिवराम जी को याद है कि जब पहली बार यह खबर गाँव में पहुंची थी, तब लोगों को इस नई व्यवस्था के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे जब पंचायत चुनाव हुए, तो गाँव में एक नई रोशनी फैली। पहली बार गाँव के लोग खुद अपने प्रतिनिधि चुनने लगे थे। जमींदारों की पकड़ ढीली पड़ने लगी, और ग्रामीण लोगों को यह समझ में आने लगा कि अब उनके पास अपनी समस्याओं का हल निकालने का एक सशक्त माध्यम है।
जब छत्तीसगढ़ 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होकर एक नया राज्य बना, तब गाँवों के विकास को और तेज़ी मिली। पंचायती राज व्यवस्था को और भी सुदृढ़ किया गया, और योजनाओं को सीधे गाँवों तक पहुँचाने की कोशिशें शुरू हुईं। मनरेगा जैसी योजनाओं ने गाँव के लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया। गाँव की महिलाएँ भी अब पंचायतों का हिस्सा बनने लगीं। शिवराम जी के मन में आज भी वह गर्व का क्षण ताजा था, जब पहली बार गाँव की एक महिला को पंचायत का सदस्य चुना गया था। वह दिन था, जब गाँव की परंपरागत सोच में एक बड़ा बदलाव आया था।

आज 2025 में फिर से पंचायत चुनाव हो रहे थे। शिवराम जी चौपाल पर बैठे थे और देख रहे थे कि कैसे गाँव के युवा, जिनमें उनके पोते रामू भी शामिल थे, चुनाव को लेकर उत्साहित थे। रामू पहली बार वोट देने वाला था, और वह अपने दादा से पूछ बैठा, “दादाजी, यह पंचायती राज क्यों इतना महत्वपूर्ण है?” शिवराम जी ने गहरी साँस ली और मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, पहले हमारे गाँव के फैसले गाँव के लोग नहीं, जमींदार करते थे। लेकिन पंचायती राज ने हमें वो अधिकार दिया है कि अब हम अपने गाँव का भविष्य खुद तय कर सकते हैं।”
गाँव का चुनावी माहौल देखकर शिवराम जी को वह समय याद आया, जब गाँव के लोग अपने विकास के लिए बाहर के नेताओं और अधिकारियों पर निर्भर रहते थे। सरकारी योजनाएँ भी उनके दरवाजे तक नहीं पहुँचती थीं। लेकिन अब सब बदल चुका था। पंचायतें अब गाँव के विकास की धुरी बन चुकी थीं। पहले जहाँ गाँव में सड़कों का नामोनिशान नहीं था, अब पक्की सड़कें बन चुकी थीं। गाँव के स्कूलों में बच्चे पढ़ाई कर रहे थे, और कई लड़के-लड़कियाँ अब शहर जाकर भी पढ़ाई कर रहे थे। शिवराम जी के पोते भी उन बच्चों में शामिल थे, जिन्हें पंचायत द्वारा मुहैया कराई गई सुविधाओं का लाभ मिला था।
गाँव की महिलाएँ, जो कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, अब स्वयं सहायता समूह बनाकर गाँव की अर्थव्यवस्था में योगदान दे रही थीं। पंचायत चुनावों में भी महिलाएँ सक्रिय रूप से हिस्सा ले रही थीं। इस बार के चुनाव में गाँव की एक महिला सरपंच पद के लिए भी खड़ी थी। यह देखकर शिवराम जी को अपनी उस पुरानी बात पर विश्वास और भी गहरा हो गया कि पंचायती राज ने सिर्फ विकास नहीं, बल्कि समाज में समानता और स्वाभिमान की भावना को जन्म दिया है।
जब रामू अपने दादा से चुनाव के बाद की उम्मीदों के बारे में पूछता है, तो शिवराम जी कहते हैं, “बेटा, चुनाव में चाहे कोई भी जीते, लेकिन हमारा गाँव अब पहले से कहीं बेहतर है। अब फैसले हमारी पंचायत करती है, और हम सब मिलकर अपने गाँव का भविष्य संवार सकते हैं। यह लोकतंत्र की असली ताकत है, जहाँ हर व्यक्ति की आवाज़ सुनी जाती है।”
गाँव के बच्चे, युवा, महिलाएँ, और बुजुर्ग सभी अब अपने गाँव के विकास में शामिल हो चुके थे। हर तीन महीने में ग्राम सभा की बैठक होती थी, जिसमें गाँव के हर व्यक्ति को बोलने का मौका मिलता था। चुनावी माहौल चाहे जितना भी हो, लेकिन गाँव की एकता और विकास की दिशा स्पष्ट थी। शिवराम जी को अपने गाँव पर गर्व था कि उन्होंने समय के साथ-साथ विकास की यह यात्रा पूरी की है। पंचायत चुनावों के माध्यम से जो जागरूकता और भागीदारी आई थी, उसने गाँव के हर व्यक्ति को सशक्त बनाया था। पंचायती राज व्यवस्था न केवल सत्ता का विकेंद्रीकरण है, बल्कि यह लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का एक साधन है।

अच्छा लिखा है