विगत दिनों पिता जी का 86 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया। आज गाँव में उनकी तेरहवीं पूरी विधि-विधान से सम्पन्न की गई। पिता जी की आखिरी साँसें शहर के हमारे घर पर निकलीं, लेकिन उनका मन हमेशा गाँव में ही बसा था। उम्र के आखिरी पड़ाव पर, मजबूरी में हमें उन्हें शहर लाना पड़ा, क्योंकि अब वे उतने सक्षम नहीं रहे थे। शारीरिक रूप से कमजोर हो गए थे, लंबे होने के कारण उनकी कमर झुक चुकी थी, और ठीक से चल भी नहीं पाते थे। परन्तु उनकी आत्मा कभी थकी नहीं। जीवनभर धोती-कुर्ता पहनने वाले पिता जी अंतिम समय तक उसी ठाठ-बाट से जिए। जब उनकी साँसें थमीं, तो ऐसा महसूस हुआ कि उन्होंने अपनी मर्जी से ही देह त्याग दी। बस एक दिन के लिए बिस्तर पर पड़े, खाना-पीना छोड़ दिया, और अगले ही दिन चुपचाप संसार को अलविदा कह दिया।
गाँव में हमारा पुश्तैनी मकान है, लेकिन अब वहाँ कोई स्थायी रूप से नहीं रहता, इसलिए वह धीरे-धीरे खंडहर में बदलने लगा है। जब पिता जी जीवित थे, तब अकेले ही उस मकान में रहते। त्योहारों पर हम सब गाँव आते, घर की सफाई और रंग-रोगन करवा दिया करते थे। मुझे याद है, जब मैं प्राथमिक स्कूल में था, करीब 50 साल पहले, पिता जी गाँव के पटेल हुआ करते थे। पटेल, यानी जब पंचायती राज अधिनियम लागू नहीं हुआ था, तब गाँव के नेता पटेल ही होते थे। वे कई वर्षों तक पटेल रहे और उन्हीं दिनों बड़े अदब से यह मकान बनवाया था।

इस मकान की दीवारें पत्थरों की बनी थीं, जिन्हें उस दौर के कारीगरों ने बड़ी शिद्दत से तराशा था। लकड़ी से बना भव्य दरवाज़ा और ऊपर खपरैल की छत, जो गर्मियों में घर को ठंडा रखती थी, यह मकान उस समय गाँव का आकर्षण केंद्र था। यह मकान न जाने कितने लोगों की गवाह रही है। कई बार इसकी छत के नीचे किसी ने अपनी खुशियाँ बांटीं तो किसी ने अपने आँसू। लेकिन अब, जैसे-जैसे हम शहर की तरफ़ खिंचते चले गए, यह मकान भी खंडहर में तब्दील होता गया। जो कभी गाँव की शान था, आज वीरान पड़ा है।
पिता जी के साथ यह मकान भी जीवंत था। जब तक वे थे, तब तक गाँव के इस घर में रौनक थी। लेकिन असल में यह घर तभी से ख़ाली हो गया था जब हमारी माँ हमें छोड़कर चली गईं। माँ का निधन मेरी बहन के जन्म के समय ही हो गया था, और तब से पिता जी ने दूसरी शादी कभी नहीं की। उन्होंने अपना पूरा जीवन हम बच्चों की परवरिश में बिता दिया। माँ की कमी उन्होंने कभी किसी से पूरी नहीं करवाई, खुद ही हमारे लिए माँ और पिता दोनों बने रहे। जब माँ गईं, तब शायद पिता जी ने ही मन में यह ठान लिया था कि वे अपना सारा जीवन हम बच्चों को समर्पित करेंगे।
मैंने कभी पिता जी को थकते नहीं देखा। माँ के जाने के बाद उन्होंने हम सभी को जिस तरह से संभाला, वह अब सोचकर भी भावुक कर देता है। एक बार भी उन्होंने यह महसूस नहीं होने दिया कि माँ की कमी है, लेकिन हम सभी जानते थे कि उनके अकेलेपन का बोझ कितना भारी था। उन्होंने गाँव में अकेले रहते हुए भी अपने आपको मजबूत बनाए रखा। लेकिन जीवन के अंत तक, वह अकेलापन उनके साथ ही रहा।

आज सोचता हूँ, जब माँ हमें छोड़कर गईं, तब शायद उनका यह पुश्तैनी मकान भी थोड़ा-थोड़ा खाली होने लगा था। पिता जी ने इसे जिंदा रखा, लेकिन माँ की अनुपस्थिति इस मकान में हर जगह महसूस होती रही। आज जब पिता जी भी चले गए, तो लगता है कि यह मकान पूरी तरह से खंडहर हो चुका है—जैसे यह उनके साथ ही अंतिम सांसें ले रहा हो।
अब, जब गाँव लौटता हूँ, तो वह मकान मुझे देखता है, जैसे मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रहा हो। उसकी दीवारों पर वक्त की मार साफ दिखाई देती है, और छत, जो कभी हमारा सिर बचाया करती थी, अब गिरने लगी है। जो घर कभी माँ की देखभाल और पिता जी के प्यार से भरा था, अब उसकी रौनक हमेशा के लिए बुझ गई है। पिता जी ने माँ के बिना पूरा जीवन अकेले गुजार दिया, और अब उनके जाने के बाद वह मकान भी उस अकेलेपन में सिमट गया है।
मैं अगले साल सेवानिवृत्त हो जाऊँगा और शायद गाँव लौटकर रहना चाहूँ, लेकिन मेरे बच्चे शायद अब उस मकान में कभी नहीं रह पाएँगे। शहर की चकाचौंध और सुविधाओं ने उन्हें हमसे दूर कर दिया है, जैसे मेरे पिता मुझसे दूर हो गए थे। शायद मैं भी उस खंडहर को फिर से बसाने की कोशिश करूँ, गाँव से शहर की ओर बढ़ता यह पलायन न जाने कितनी पीड़ाओं को अपने साथ लिए चलता है। और मैं, एक पुत्र, जो अब स्वयं पिता बन चुका हूँ, इस पीड़ा को अपने भीतर संजोए हुए, यह सोचता हूँ कि क्या कभी हम फिर से उस मिट्टी की ओर लौटेंगे, जहाँ से हमारा अस्तित्व शुरू हुआ था?
शायद यही नियति है—गाँवों से शहरों की ओर पलायन और पीछे छूटते वे मकान, जो कभी परिवारों की धड़कन हुआ करते थे।खंडहर में तब्दील होते मकान सिर्फ ईंट और पत्थरों की कहानी नहीं होते, वे उन रिश्तों और सपनों की गाथाएँ होते हैं जो कभी जीवंत थे।

अच्छा लिखा है
बहुत ही खूबसूरत लिखा है भाई पुरा दृश्य याद आ गया। दिल छु गया।
धन्यवाद मेरे भाई
बहुत सुंदर
बहुत ही सुंदर और सराहनीय लेख है आपका और आपके विचार भी बहुत सुंदर हैं उम्र के पड़ाव आते आते हमे भी लगता है कुछ पीछे छुट गया हैं आपके लेख के नज़रो से अभिभूत हुए हैं आप का आभार
प्रतिक्रिया हेतु आपका सादर आभार डॉ साहब